गाजियाबाद। गाजियाबाद से एक बेहद भावुक और संवेदनशील घटना सामने आई है, जिसने पूरे देश में जीवन और मृत्यु से जुड़े नैतिक सवालों पर चर्चा शुरू कर दी है। 13 वर्षों से गंभीर अवस्था में जीवन-रक्षक उपकरणों पर निर्भर रहे हरिश राणा को सुप्रीम कोर्ट से पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति मिलने के बाद उनके परिवार ने अस्पताल में उन्हें अंतिम विदाई दी।
गाजियाबाद से एक बेहद भावुक और संवेदनशील घटना सामने आई है, जिसने पूरे देश में जीवन और मृत्यु से जुड़े नैतिक सवालों पर चर्चा शुरू कर दी है। 13 वर्षों से गंभीर अवस्था में जीवन-रक्षक उपकरणों पर निर्भर रहे हरिश राणा को सुप्रीम कोर्ट से पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति मिलने के बाद उनके परिवार ने अस्पताल में उन्हें अंतिम विदाई दी।
Read More: गोरखपुर जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने वरिष्ठ पत्रकार कमर अहमद आज़ाद को 25वीं पुण्यतिथि पर किया स्मरण
दिल्ली के एम्स (AIIMS) में डॉक्टरों द्वारा जीवन-रक्षक उपकरण हटाने से पहले परिवार के लोग उनके पास इकट्ठा हुए। इस दौरान का एक भावुक वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आया है, जिसमें परिवार के सदस्य राणा के पास बैठकर उनसे अंतिम बार बातें करते और विदा लेते दिखाई दे रहे हैं।
परिवार की भावुक विदाई
वीडियो में हरिश राणा बिस्तर पर निश्चल अवस्था में लेटे हुए दिखाई देते हैं, जबकि उनके परिवार के सदस्य उनके आसपास बैठे हैं। उनकी माँ लगातार उनके पास बैठी रहीं और बेहद भावुक नजर आईं।
परिवार से जुड़ी आध्यात्मिक संस्था ब्रह्माकुमारी की एक सदस्य ने उनके माथे पर तिलक लगाया। उसी दौरान एक महिला ने उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“सबको माफ कर दो, सब से माफी मांग लो… अब जाने का समय आ गया है।”
यह दृश्य उन 13 वर्षों के दर्द और संघर्ष को दिखाता है, जो इस परिवार ने हरिश राणा की देखभाल करते हुए झेला।
क्या है पैसिव यूथेनेशिया
पैसिव यूथेनेशिया का अर्थ है ऐसे मरीज की जीवन-रक्षक चिकित्सा को बंद कर देना या शुरू न करना, जो लंबे समय से असाध्य बीमारी या स्थायी बेहोशी की स्थिति में हो और जिसके ठीक होने की कोई संभावना न हो।
इसमें मरीज की मौत जानबूझकर नहीं कराई जाती, बल्कि वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या अन्य कृत्रिम जीवन-सहायक साधनों को हटा दिया जाता है, जिससे प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो जाती है।
यह एक्टिव यूथेनेशिया से अलग है, जिसमें जानबूझकर दवा या किसी अन्य तरीके से मृत्यु दी जाती है।
2013 की दुर्घटना ने बदल दी जिंदगी
हरिश राणा की जिंदगी वर्ष 2013 में एक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई थी। वह एक इमारत की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके मस्तिष्क में गंभीर चोट आई।
इस दुर्घटना के बाद वह लगभग पूरी तरह से बिस्तर पर ही रहे और उनकी हालत में कोई खास सुधार नहीं हुआ। सांस लेने के लिए उन्हें ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब लगाई गई थी, जबकि भोजन के लिए गैस्ट्रोजेजुनोस्टॉमी ट्यूब का सहारा लिया जाता था।
करीब 13 वर्षों तक परिवार ने उनकी लगातार देखभाल की, लेकिन डॉक्टरों ने भी माना कि उनके ठीक होने की संभावना बेहद कम है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
आखिरकार हरिश राणा के माता-पिता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और बेटे के लिए गरिमा के साथ मृत्यु (Right to Die with Dignity) की अनुमति मांगी।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी।
अपने फैसले में अदालत ने कहा कि किसी प्रिय व्यक्ति से प्रेम करने का अर्थ सिर्फ खुशियों में साथ होना नहीं, बल्कि उसके सबसे कठिन समय में भी उसके साथ खड़े रहना है। अदालत ने राणा के माता-पिता और परिवार की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने वर्षों तक असाधारण धैर्य और समर्पण दिखाया।
कानून, चिकित्सा और करुणा का संगम
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला मौत चुनने का नहीं, बल्कि ऐसी स्थिति में कृत्रिम रूप से जीवन को लंबा न खींचने का है, जहां सुधार की कोई उम्मीद नहीं है।
न्यायाधीशों ने कहा कि यह मामला सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि प्रेम, पीड़ा, चिकित्सा और करुणा के जटिल संतुलन का उदाहरण है।
Read More: Inter Media Cricket Tournament में दैनिक भास्कर बना चैंपियन, इलेक्ट्रॉनिक्स सीपीसी रनर-अप
अरुणा शानबाग केस से तुलना
भारत में इच्छामृत्यु को लेकर सबसे चर्चित मामला अरुणा शानबाग का था। मुंबई के केईएम अस्पताल की नर्स अरुणा 1973 में हमले के बाद दशकों तक कोमा में रहीं। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया के लिए दिशा-निर्देश दिए थे, लेकिन उन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी गई थी।
हरिश राणा का मामला इसलिए खास माना जा रहा है क्योंकि यह पहला मामला है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर किसी व्यक्ति के लिए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी है।
हरिश राणा के परिवार के लिए यह फैसला एक तरफ गहरा दुख लेकर आया है, तो दूसरी ओर वर्षों की पीड़ा के बाद एक तरह की शांति भी। यह घटना देश में जीवन, मृत्यु और मानव गरिमा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर नई बहस को जन्म दे रही है।

