काबुल/इस्लामाबाद। कभी एक-दूसरे के करीबी सहयोगी रहे पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच अब तनाव खुली लड़ाई में बदलता नजर आ रहा है। हाल ही में पाकिस्तान द्वारा काबुल में किए गए एयरस्ट्राइक के बाद दोनों देशों के रिश्तों में भारी गिरावट आई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने सोमवार रात काबुल में हवाई हमला किया। अफगान तालिबान का दावा है कि इस हमले में करीब 400 लोगों की मौत हुई और 250 से ज्यादा घायल हुए, हालांकि पाकिस्तान ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि उसने सिर्फ “आतंकी ठिकानों और सैन्य ढांचे” को निशाना बनाया।
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यह घटनाक्रम दोनों देशों के बीच तेजी से बढ़ते तनाव का संकेत है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री पहले ही इस स्थिति को “ओपन वॉर” यानी खुला युद्ध करार दे चुके हैं। इससे पहले फरवरी में भी पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में कई हवाई हमले किए थे।
दोस्ती से टकराव तक का सफर
गौरतलब है कि 2021 में जब अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता वापसी हुई थी, तब पाकिस्तान ने इसका खुले तौर पर स्वागत किया था। उस समय के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा था कि अफगानों ने गुलामी की जंजीरें तोड़ दी हैं।
लेकिन समय के साथ यह रिश्ता बिगड़ता चला गया। पाकिस्तान का आरोप है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के लड़ाके अफगानिस्तान में शरण लेकर पाकिस्तान में आतंकी हमले कर रहे हैं। इसके अलावा बलूच अलगाववादी समूहों पर भी अफगान जमीन इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया है।
दूसरी ओर, अफगान तालिबान इन आरोपों को सिरे से खारिज करता है। उनका कहना है कि वे अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी भी देश के खिलाफ नहीं होने देते। उल्टा, तालिबान ने पाकिस्तान पर इस्लामिक स्टेट (ISIS) के लड़ाकों को पनाह देने का आरोप लगाया है, जिसे इस्लामाबाद नकारता है।
ताजा झड़प की वजह क्या?
फरवरी में हुए हमलों से पहले पाकिस्तान ने दावा किया था कि उसके पास “पुख्ता सबूत” हैं कि हालिया आतंकी हमलों के पीछे अफगानिस्तान में बैठे आतंकियों का हाथ है। इन हमलों में आत्मघाती हमले भी शामिल थे, जिनमें कई पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मी मारे गए।
पाकिस्तान के अनुसार, बजौर जिले में हुए एक बड़े हमले में 11 सुरक्षाकर्मी और दो नागरिकों की मौत हुई थी, जिसे TTP ने अंजाम दिया और इसमें एक अफगान नागरिक शामिल था।
कौन है TTP
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की स्थापना 2007 में हुई थी। यह संगठन पाकिस्तान के भीतर कई बड़े आतंकी हमलों के लिए जिम्मेदार रहा है। बाजारों, मस्जिदों, एयरपोर्ट और सैन्य ठिकानों पर हमले इसके निशाने पर रहे हैं।
यही संगठन 2012 में मलाला यूसुफजई पर हमले के लिए भी जिम्मेदार था। मलाला को बाद में नोबेल शांति पुरस्कार मिला।
आगे क्या हो सकता है
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह संघर्ष और तेज हो सकता है। पाकिस्तान अपनी सैन्य कार्रवाई बढ़ा सकता है, जबकि अफगान तालिबान सीमा पर जवाबी हमले और गुरिल्ला रणनीति अपना सकता है।
सैन्य ताकत के लिहाज से दोनों देशों में बड़ा अंतर है। पाकिस्तान के पास 6 लाख से ज्यादा सक्रिय सैनिक, सैकड़ों लड़ाकू विमान और परमाणु हथियार हैं, जबकि तालिबान के पास सीमित संसाधन और कमजोर वायुसेना है।
हालांकि, इस संघर्ष का असर पूरे क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ सकता है। पहले चीन जैसे देशों ने मध्यस्थता कर तनाव कम कराने की कोशिश की थी, लेकिन हालिया घटनाओं ने हालात फिर बिगाड़ दिए हैं।
फिलहाल, पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच बढ़ता टकराव दक्षिण एशिया के लिए एक गंभीर सुरक्षा चुनौती बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या कूटनीतिक प्रयास हालात संभाल पाते हैं या यह संघर्ष और गहराता है।

