नई दिल्ली। भारत की अर्थव्यवस्था भले ही विकास की राह पर आगे बढ़ रही हो, लेकिन कई राज्य ऐसे हैं जो लगातार बढ़ते कर्ज (State Debt) के दबाव से जूझ रहे हैं। बुनियादी ढांचे के विकास, सामाजिक योजनाओं, वेतन-पेंशन और राजस्व घाटे को पूरा करने के लिए राज्यों को बड़े पैमाने पर उधार लेना पड़ता है। हालिया आर्थिक रिपोर्टों और बजट आंकड़ों के मुताबिक देश के कुछ राज्य ऐसे हैं जिन पर कर्ज का बोझ तेजी से बढ़ा है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है।
इस सूची में पंजाब का नाम सबसे ऊपर गिना जाता है। पंजाब पर लंबे समय से कर्ज का भारी दबाव है। मुफ्त बिजली, सब्सिडी योजनाएं, कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन जैसे खर्चों ने राज्य की वित्तीय सेहत को कमजोर किया है। राजस्व की तुलना में खर्च अधिक होने के कारण कर्ज लगातार बढ़ता गया है, जिससे विकास परियोजनाओं के लिए नई चुनौती खड़ी हो रही है।
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केरल भी कर्ज में डूबे राज्यों में शामिल है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद राज्य की आय सीमित है। सामाजिक कल्याण योजनाओं और वेतन-पेंशन पर अधिक खर्च के कारण केरल का कर्ज स्तर ऊंचा बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यटन और सेवा क्षेत्र से आय बढ़ाकर राज्य इस बोझ को कुछ हद तक कम कर सकता है।
पश्चिम बंगाल की वित्तीय स्थिति भी लंबे समय से दबाव में है। ऐतिहासिक कर्ज, सीमित औद्योगिक विकास और बढ़ते प्रशासनिक खर्च ने राज्य की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। केंद्र से मिलने वाली सहायता और उधारी के सहारे ही कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिससे कुल कर्ज और बढ़ता जा रहा है।
राजस्थान का नाम भी कर्जग्रस्त राज्यों में लिया जाता है। बड़े भू-भाग और ग्रामीण आबादी के कारण यहां सामाजिक योजनाओं पर खर्च ज्यादा है। पानी, बिजली और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी योजनाओं के लिए सरकार को लगातार कर्ज लेना पड़ रहा है, जिससे वित्तीय संतुलन बिगड़ रहा है।
तमिलनाडु देश के औद्योगिक रूप से मजबूत राज्यों में से एक है, लेकिन इसके बावजूद यहां भी कर्ज का स्तर काफी ऊंचा है। इंफ्रास्ट्रक्चर, शहरी विकास और सामाजिक योजनाओं पर बड़े पैमाने पर खर्च के कारण राज्य पर कर्ज बढ़ा है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि मजबूत औद्योगिक आधार के चलते तमिलनाडु की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में थोड़ी बेहतर है।
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आंध्र प्रदेश में राज्य के विभाजन के बाद से ही वित्तीय चुनौतियां बनी हुई हैं। नई राजधानी, प्रशासनिक ढांचे और कल्याणकारी योजनाओं पर भारी खर्च के चलते राज्य पर कर्ज तेजी से बढ़ा है। राजस्व स्रोत सीमित होने के कारण उधारी पर निर्भरता अधिक है।
बिहार भी उन राज्यों में शामिल है जहां प्रति व्यक्ति आय कम और सरकारी खर्च अधिक है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए बड़े बजट की जरूरत होती है, जिसे पूरा करने के लिए राज्य को कर्ज लेना पड़ता है। औद्योगिक निवेश की कमी भी एक बड़ी वजह मानी जाती है।
मध्य प्रदेश में कृषि, ग्रामीण विकास और बुनियादी ढांचे पर खर्च के चलते कर्ज का बोझ बढ़ा है। किसान योजनाएं और सब्सिडी राज्य के बजट पर दबाव डालती हैं, जिससे उधारी बढ़ती है।
उत्तर प्रदेश, जो देश का सबसे बड़ा राज्य है, विकास परियोजनाओं और सामाजिक योजनाओं पर भारी खर्च करता है। बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के बावजूद जनसंख्या अधिक होने के कारण संसाधनों पर दबाव रहता है, जिससे कर्ज का स्तर ऊंचा बना हुआ है।
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झारखंड भी खनिज संपदा से समृद्ध होने के बावजूद वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। प्रशासनिक खर्च, सामाजिक योजनाएं और सीमित राजस्व संग्रह इसकी प्रमुख वजहें हैं।
कुल मिलाकर, इन राज्यों पर बढ़ता कर्ज न केवल उनकी आर्थिक सेहत के लिए, बल्कि देश की समग्र वित्तीय स्थिरता के लिए भी चुनौती है। विशेषज्ञों का मानना है कि कर्ज से बाहर निकलने के लिए राज्यों को राजस्व बढ़ाने, खर्च में संतुलन बनाने और दीर्घकालिक आर्थिक सुधारों पर ध्यान देना होगा, ताकि विकास की रफ्तार बनी रहे और आने वाली पीढ़ियों पर बोझ न पड़े।

