इंदौर/नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में चल रहे ईरान-इज़रायल संघर्ष को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ी हुई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल इसका भारत की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है। हालांकि सरकार और आर्थिक विशेषज्ञ स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि यदि संघर्ष लंबे समय तक चलता है या क्षेत्रीय युद्ध में बदलता है तो ऊर्जा, व्यापार और वित्तीय बाजारों पर दबाव बढ़ सकता है।
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भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, बड़े झटके की संभावना कम
आर्थिक मामलों से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि मौजूदा हालात में भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका कोई बड़ा या स्थायी प्रभाव पड़ने की आशंका नहीं है। भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति, बढ़ता निवेश और बुनियादी ढांचे पर सरकार का खर्च ऐसे वैश्विक संकटों के प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर संघर्ष सीमित रहता है तो भारत केवल कुछ अस्थायी उतार-चढ़ाव का सामना करेगा।
तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव से पड़ सकता है असर
हालांकि युद्ध का सबसे बड़ा संभावित असर तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और पश्चिम एशिया से तेल की आपूर्ति महत्वपूर्ण है। ऐसे में यदि क्षेत्र में तनाव बढ़ता है और तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो इससे महंगाई और आयात लागत बढ़ सकती है।
रिपोर्टों के अनुसार हाल के तनाव के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई है और इसका असर मुद्रा बाजार पर भी पड़ा है। भारतीय रुपया भी दबाव में आया और निवेशकों में अस्थिरता देखने को मिली।
ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्ग चिंता का विषय
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष बढ़ता है तो सबसे बड़ा खतरा हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर पड़ सकता है। यह मार्ग वैश्विक तेल व्यापार का अहम हिस्सा है और भारत की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा भाग इसी रास्ते से आता है। यदि यहां से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल संभव है।
भारत सरकार ऐसी स्थिति से निपटने के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बढ़ाने और आयात स्रोतों में विविधता लाने जैसे कदमों पर भी काम कर रही है।
कुछ क्षेत्रों पर पहले से दिख रहा असर
हालांकि अभी व्यापक आर्थिक संकट की स्थिति नहीं है, लेकिन कुछ क्षेत्रों पर शुरुआती असर दिखाई देने लगा है। ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान और गैस की कमी के कारण कुछ उद्योगों को उत्पादन और आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उर्वरक, सिरेमिक, वस्त्र और टायर जैसे उद्योगों में लागत बढ़ने और आपूर्ति में देरी जैसी समस्याएं सामने आई हैं।
इसके अलावा वैश्विक सप्लाई चेन और शिपिंग मार्गों में तनाव बढ़ने से निर्यात लागत भी बढ़ सकती है, जिससे व्यापारिक गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका है।
निर्यात और व्यापार पर भी पड़ सकता है प्रभाव
भारत का पश्चिम एशिया के कई देशों के साथ बड़ा व्यापारिक संबंध है। यदि संघर्ष बढ़ता है तो शिपिंग लागत और बीमा खर्च बढ़ सकते हैं, जिससे निर्यात प्रभावित हो सकता है। विशेष रूप से कृषि और खाद्य उत्पादों के निर्यात में देरी और लागत बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
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सरकार स्थिति पर रखे हुए है नजर
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल स्थिति पर करीबी निगरानी रखी जा रही है। वित्त मंत्रालय और अन्य आर्थिक एजेंसियां वैश्विक बाजार, तेल की कीमतों और व्यापारिक गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। यदि जरूरत पड़ी तो ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
यदि संघर्ष सीमित दायरे में रहता है तो भारत की अर्थव्यवस्था इसे आसानी से संभाल सकती है। लेकिन यदि युद्ध लंबा खिंचता है या क्षेत्रीय स्तर पर और फैलता है, तो तेल की कीमतों, व्यापार मार्गों और वैश्विक बाजारों पर इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है।

