तमिलनाडु।
तमिलनाडु के त्रिची जिले में पोंगल पर्व की शुरुआत परंपरागत जलीकट्टू 2026 के साथ जोश और उत्साह के माहौल में हुई। त्रिची के पास स्थित पेरिया सूरियूर गांव में आयोजित इस जलीकट्टू प्रतियोगिता में करीब 750 सांडों और 500 से अधिक सांड काबू करने वालों (तमरों) ने हिस्सा लिया। ढोल-नगाड़ों की गूंज, दर्शकों के उत्साह और दौड़ते सांडों के बीच यह आयोजन तमिल संस्कृति, शौर्य और परंपरा का जीवंत प्रतीक बन गया।
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यह जलीकट्टू त्रिची जिले का इस वर्ष का पहला आयोजन था और खास बात यह रही कि इसे पहली बार नवनिर्मित स्थायी जलीकट्टू अखाड़े में आयोजित किया गया। यह प्रतियोगिता तमिल माह ‘थाई’ के दूसरे दिन श्री नारकदल कुडी करुप्पन्नासामी मंदिर के वार्षिक उत्सव के तहत हुई। पहले यह आयोजन अस्थायी मैदानों में होता था, लेकिन ग्रामीणों की मांग पर राज्य सरकार ने करीब 3 करोड़ रुपये की लागत से स्थायी अखाड़े का निर्माण कराया। उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने हाल ही में इस अखाड़े का उद्घाटन किया था।
सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अखाड़े में मजबूत बैरिकेड्स, सुरक्षित वाडीवासल (सांड छोड़ने का द्वार) और दर्शकों के लिए अलग गैलरी बनाई गई है। प्रतियोगिता को 10 राउंड में आयोजित किया गया। परंपरा के अनुसार सबसे पहले मंदिर के सांड को छोड़ा गया, इसके बाद तमरों ने शपथ ली। जिला कलेक्टर सरवनन ने हरी झंडी दिखाकर आयोजन की शुरुआत की।
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जलीकट्टू, जिसे एरु थाझुवुथल या मन्जू विरट्टू भी कहा जाता है, तमिल कृषि संस्कृति और पोंगल उत्सव से गहराई से जुड़ा हुआ है। लंबे समय तक विवादों और प्रतिबंधों के बाद, 2017 में नियमों के तहत इसे फिर से अनुमति मिली, और आज यह परंपरा एक बार फिर पूरे गर्व के साथ जीवित नजर आई।

