Saturday, January 24, 2026

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दम घुटने और हार्ट फेलियर से हुई नोएडा के टेक इंजीनियर युवराज मेहता की मौत

नोएडा |

ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-150 में हुए दर्दनाक हादसे को लेकर सामने आई पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने दिल दहला देने वाले खुलासे किए हैं। 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत दम घुटने और कार्डियक फेलियर के कारण हुई। युवराज ने पानी से भरे गहरे गड्ढे में गिरने के बाद करीब 90 मिनट तक जिंदगी और मौत से संघर्ष किया।

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यह हादसा 16-17 जनवरी की रात करीब 12:30 बजे हुआ। युवराज सेक्टर-150 में रहते थे और अपनी ग्रैंड विटारा कार से घर लौट रहे थे। उस वक्त इलाके में घना कोहरा था, रोशनी बेहद कम थी और सड़क किनारे सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। एटीएस के पास उनकी गाड़ी क्षतिग्रस्त बाउंड्री वॉल तोड़ते हुए करीब 30 फीट गहरे पानी से भरे गड्ढे में जा गिरी।

हादसे के बाद युवराज पूरी तरह से फंसे नहीं थे। प्रत्यक्षदर्शियों और परिवार के अनुसार, वह किसी तरह गाड़ी की छत पर चढ़ गए। उन्होंने बार-बार अपने मोबाइल फोन की टॉर्च जलाकर आसपास मौजूद लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश की। युवराज ने अपने पिता को फोन कर मदद की गुहार भी लगाई। चश्मदीदों का दावा है कि कई लोग मौके पर मौजूद थे, लेकिन अंधेरा, कोहरा और अव्यवस्था के चलते समय पर मदद नहीं पहुंच पाई।

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सूचना मिलते ही पुलिस, फायर ब्रिगेड की टीमें मौके पर पहुंचीं, लेकिन करीब शून्य दृश्यता, अत्यधिक ठंडा पानी और गड्ढे की गहराई के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन बेहद मुश्किल हो गया। एक डिलीवरी बॉय ने साहस दिखाते हुए बर्फ जैसे ठंडे पानी में छलांग लगाई, लेकिन युवराज को ढूंढ नहीं सका। करीब सुबह 4:30 बजे युवराज का शव बाहर निकाला गया। तब तक वह डेढ़ घंटे से ज्यादा समय तक पानी में रह चुके थे। इस हादसे के बाद स्थानीय लोगों और युवराज के दोस्तों ने प्रशासनिक लापरवाही और देरी से रेस्क्यू का आरोप लगाया है। आरोप है कि निर्माणाधीन साइट पर बैरिकेटिंग, रिफ्लेक्टर, फेंसिंग और चेतावनी संकेत नहीं लगाए गए थे। पुलिस ने इस मामले में खुले गड्ढे के लिए जिम्मेदार बिल्डरों के खिलाफ FIR दर्ज की है। इसके अलावा ट्रैफिक मैनेजमेंट और सुरक्षा में चूक को लेकर संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को शो-कॉज नोटिस जारी किए गए हैं। प्रशासन ने एक जूनियर इंजीनियर को बर्खास्त कर दिया है और सभी निर्माण स्थलों की सुरक्षा जांच के आदेश दिए गए हैं। यह घटना एक बार फिर सवाल खड़े करती है कि क्या निर्माण स्थलों की लापरवाही और प्रशासनिक ढिलाई की कीमत आम नागरिकों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी।

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