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बेटी ससुराल में रोज़ टूटती रही। सुबह से रात तक सबकी सेवा की, हर बात मानी, अपने हिस्से का आसमान भी दूसरों के नाम कर दिया। पर सुकून न मिला। पति का साथ नहीं, ससुराल में इज़्ज़त नहीं। जब भी मायके में फोन कर दुख बताया, जवाब एक ही मिला – “बेटा निभा लो, रिश्ते तोड़े नहीं जाते। थोड़ा सह लो, सब ठीक हो जाएगा।”
बेटी ने सहा। 20 साल सहा। उम्मीद में कि शायद कल बेहतर होगा। शायद ‘निभा लो’ मंत्र काम कर जाए।
आज वक़्त का पहिया घूमा। उन्हीं माँ-बाप के घर बहू आई है। लाख कोशिशों के बाद भी वो घर में तनाव की वजह बनी हुई है। बेटा भी पत्नी का ही पक्ष लेता है। रोज़ की धमकियां, ताने, बेइज़्ज़ती। 8 साल में माँ-बाप थक चुके हैं। जिस ‘निभाने’ की नसीहत वो बेटी को देते थे, आज खुद उसी दोराहे पर खड़े हैं। बेटे-बहू से अलग रहना चाहते हैं। यहां तलाक नहीं क्योंकि मां-बाप के पास अलग रहने का विकल्प है। बेटी के पास नहीं था इसलिए उसे निभाने की ही सलाह दी जा रही थी।
अब बेटी अगर फोन पर कहे कि “माँ-पापा, निभा लो”, तो कैसा लगेगा? शायद अब समझ आए कि दर्द सहने वाला ही जानता है कि हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरना क्या होता है।
निभा लो’ – संस्कार या सज़ा?
हमारे समाज में ‘निभा लो’ एक ऐसा मरहम है जो हर ज़ख्म पर लगा दिया जाता है। बिना ये देखे कि ज़ख्म कितना गहरा है, नासूर बन चुका है या नहीं। ये मरहम सिर्फ घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं।
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ऑफिस में नौकरी बोझ बन गई है। बॉस सांस नहीं लेने देता। हर छोटी गलती पर बेइज़्ज़ती, टारगेट का पहाड़। सहकर्मी पीठ पीछे राजनीति करते हैं, आगे मुस्कुराते हैं। और हम निभा रहे हैं। क्यों? क्योंकि ‘निभा लो, वरना दूसरी नौकरी आसानी से नहीं मिलेगी’। Workplace stress और toxic work environment में भी लोग अक्सर यही सोचकर टिके रहते हैं कि किसी तरह निभा लो।
घर में पति की प्रताड़ना, सास-ससुर के ताने, पत्नी की धमकियां, बहू का रूखा व्यवहार। हर जगह एक ही डर दिखाया जाता है – ‘निभा लो, वरना दूसरा नहीं मिलेगा’। ऐसे toxic relationship में भी समाज अक्सर समझाने के बजाय सहने की सलाह देता है।
इस ‘निभा लो’ के चक्कर में हम जी नहीं रहे, तिल-तिल घुट रहे हैं। खुलकर सांस लेना भूल गए हैं। सुबह उठते ही पेट में डर की गांठ बन जाती है। रात को बिस्तर पर जाते हैं तो कल की चिंता सीने पर बैठी होती है। यह लगातार mental stress और भावनात्मक दबाव जिंदगी को भीतर से कमजोर करता रहता है।
20 साल की कीमत: जब देर हो जाए
और फिर एक दिन, 20 साल बाद, जब सहने की सारी हदें टूट गईं, बेटी ने तलाक ले लिया। पर अब? अब न नौकरी मिलती है, न करियर बन सकता है। वो सुनहरा दौर, वो उम्र जब वो फिर से अपने पैरों पर खड़ी हो सकती थी, वो ‘निभा लो’ की भेंट चढ़ चुका है। अब टांगों में इतनी ताकत नहीं बची कि वो दौड़ सके, खड़ी भी हो पाए तो बहुत है।
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समाज का तमाशा यहीं खत्म नहीं होता। अब वही पड़ोसी, वही रिश्तेदार उसे ‘डिवोर्सी’ होने का ताना देते हैं। उंगली उठाते हैं – “देखो, निभा नहीं पाई”। पीठ पीछे बातें करते हैं। बच्चों का पूरा बोझ अकेले उसके कंधों पर है। कमाने के ज़रिये सीमित हैं, हुनर पर 20 साल की जंग लग चुकी है। मायका भी अब पूरे दिल से साथ नहीं दे पाता, क्योंकि ‘लोग क्या कहेंगे’। और इस तकलीफ से कुछ बेटियां हिम्मत करके खुद को वापस खड़ा कर भी लें पर यकीन मानिए सब नहीं कर पातीं। आखिरी सांस तक बस लड़ती ही रह जाती हैं अपने हालातों से। अपने बीते समय से मिले जख्मों पर मरहम लगाते-लगाते निकल जाती है उनकी बची हुई उम्र।
काश 20 साल पहले किसी ने कहा होता – “वापस आ जा, अभी वक्त है। अभी तू उड़ सकती है।” पर तब सबने सिर्फ एक ही मंत्र दिया – ‘निभा लो’। और आज उस मंत्र की कीमत बेटी अपनी बची-खुची ज़िंदगी से चुका रही है। घुट-घुट कर जिया, और अब घुट-घुट कर बाकी उम्र काटेगी। Divorce के बाद नई शुरुआत संभव है, लेकिन कई बार देर से लिया गया फैसला career और आत्मनिर्भरता पर भी असर डालता है।
एक हाथ से ताली नहीं बजती, पर थप्पड़ बज जाता है
हम भूल जाते हैं कि रिश्ता दो लोगों से बनता है। ताली एक हाथ से नहीं बजती, ये सच है। पर थप्पड़ एक हाथ से ही बजता है। एक गलत इंसान, एक विषाक्त बॉस, एक ज़हरीला रिश्ता पूरे परिवार की, पूरी टीम की शांति भंग करने के लिए काफी है। ऐसे toxic person या toxic boss के व्यवहार का असर पूरे माहौल पर पड़ सकता है।
और ऐसे में सिर्फ एक पक्ष से ‘निभाने’ की उम्मीद करना, उसे भावनात्मक रूप से तोड़ देना है। 20 साल तक बेटी ने निभाया। क्या मिला? उम्र का सबसे कीमती हिस्सा आंसुओं में बह गया। Self respect खो दिया। और समाज ने वाहवाही तो तब भी नहीं दी। हमने सहने को ही स्त्री का गहना बना दिया।
आज वही हाल नौकरी में है। कर्मचारी 12-14 घंटे पिस रहा है, मानसिक स्वास्थ्य खो रहा है, परिवार को वक्त नहीं दे पा रहा। पर इस्तीफ़ा देने की सोचते ही आवाज़ आती है – ‘निभा लो, EMI कौन भरेगा? बच्चे की फीस? माँ-बाप की दवाई?’ मजबूरी के नाम पर हम अपनी ज़िंदगी को नर्क बना रहे हैं। यह work-life balance बिगड़ने और लगातार workplace pressure का भी उदाहरण है।
जब नसीहत देने वाले खुद कटघरे में हों
विडंबना देखिए। जिन माँ-बाप ने बेटी को ‘रिश्ता न तोड़ने’ की घुट्टी पिलाई, आज खुद बहू के व्यवहार से टूट रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब दर्द उनके दरवाज़े पर है। अब उन्हें समझ आ रहा है कि जब सामने वाला बदलने को तैयार ही न हो, जब हर कोशिश के बाद भी सिर्फ अपमान मिले, तो ‘निभाना’ खुद को खत्म करने जैसा है।
यही बात ऑफिस पर लागू होती है। जो मैनेजर जूनियर से कहता है ‘प्रेशर हैंडल करना सीखो’, वही जब ऊपर से प्रेशर आता है तो टूट जाता है। तब समझ आता है कि ‘निभा लो’ कहना आसान है, निभाना उतना ही मुश्किल जब सामने वाला आपको इंसान ही न समझे। Workplace mental stress और toxic workplace में लंबे समय तक रहना व्यक्ति की कार्यक्षमता और निजी जीवन दोनों को प्रभावित कर सकता है।
कब रुक जाना ही समझदारी है?
हर रिश्ते की, हर नौकरी की एक उम्र होती है। कोशिश की भी एक सीमा होती है। जब सम्मान न बचे, जब बातचीत की हर कोशिश गाली या धमकी में बदल जाए, जब मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दांव पर लग जाए – तब रुक जाना चाहिए।
‘लोग क्या कहेंगे’ का डर सबसे बड़ा ज़हर है। इसी डर ने लाखों बेटियों की, लाखों कर्मचारियों की ज़िंदगी नर्क बना दी। तलाक, इस्तीफ़ा, अलगाव – ये शब्द नहीं, विकल्प हैं। आखिरी विकल्प, पर विकल्प हैं। ज़बरदस्ती किसी ऐसे रिश्ते या नौकरी को ढोना जहाँ रोज़ आत्मा मरे, वो भी हिंसा है – खुद के साथ की गई हिंसा। Mental harassment और लगातार अपमान को सामान्य मान लेना किसी भी रिश्ते के लिए स्वस्थ नहीं है।
अगर कपड़ा फट चुका है, तो बार-बार रफू करने से वो और बिखरेगा। कभी-कभी जाने देना ही सबसे बड़ा प्रेम है – खुद से प्रेम। Self love और self respect भी जिंदगी का जरूरी हिस्सा हैं।
नई सोच की ज़रूरत
आज ज़रूरत है कि हम ‘निभा लो’ की जगह ‘बात कर लो’ सिखाएं। ‘सह लो’ की जगह ‘स्टैंड लो’ बताएं। बेटी को ये यकीन दिलाएं कि अगर ससुराल नर्क है, तो मायके के दरवाज़े हमेशा खुले हैं। और ये भी कि ‘देर से बेहतर है कभी नहीं’। 5 साल में फैसला ले लेना, 20 साल घुटने से बेहतर है।
8 साल में थक चुके माँ-बाप को आज एहसास हो रहा है कि 20 साल कितने लंबे होते हैं। काश ये एहसास पहले आ जाता। काश बेटी से कहते – “अगर नहीं निभ रहा, तो वापस आ जा। तेरी खुशी रिश्ते से बड़ी है। तेरा करियर, तेरी ज़िंदगी अभी बाकी है।”
यही बात बॉस को अपने जूनियर से कहनी चाहिए – “अगर यहाँ घुटन है, तो बात करो। हल निकालते हैं। और न निकले, तो तुम्हारी सेहत नौकरी से बड़ी है।”
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रिश्ते ईश्वर ने बनाए हैं, पर नर्क इंसानों ने। और जहाँ नर्क हो, वहाँ से निकल जाना ही स्वर्ग की पहली सीढ़ी है।
याद रखिए, ज़िंदगी दोबारा नहीं मिलती। 20 साल हों या 8 साल, नौकरी हो या शादी – अगर हर दिन बोझ है, तिल-तिल घुटन है, तो छोड़ देना ही बेहतर है। क्योंकि टूटे हुए लोग, टूटे हुए घर और टूटे हुए ऑफिस ही बनाते हैं। समाज को खुशहाल घर और स्वस्थ कार्यस्थल चाहिए, घुटन भरे रिश्ते और नौकरियां नहीं। देर से लिया गया सही फैसला भी, उम्र भर की गलत बर्दाश्त से बेहतर है।
रिश्ते पौधे होते हैं। रोज़ पानी दो, धूप दिखाओ, तो पनपते हैं। पर अगर एक ही इंसान सींचता रहे और दूसरा पैरों तले रौंदता रहे, तो पौधा सूख ही जाएगा।
रिश्ता निभाना ज़िम्मेदारी है, मज़बूरी नहीं। इज़्ज़त दोतरफा हो तो ही रिश्ता टिकता है। जहाँ सिर्फ एक पक्ष झुके, और दूसरा हर बार झुकाने की कोशिश करे, वहाँ रिश्ता नहीं, समझौता होता है। और समझौते उम्रभर के नहीं होते।
इसलिए रिश्तों में ‘निभा लो’ से ज़्यादा ज़रूरी है ‘समझ लो और समझा लो’। अगर फिर भी सामने वाला न समझे, तो खुद को समझा दो कि अब रुक जाना ही बेहतर है।
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