शादी के बाद वाला सन्नाटा सबसे ज्यादा शोर करता है। मंडप में बजी शहनाई जब बंद होती है, तो शुरू होती है वो कानफोड़ू खामोशी जो लगभग हर दूसरे घर की दीवारों में कैद है। हम उंगली उठाने में माहिर हैं – “लड़का निकम्मा है”, “लड़की तेज है”, “सास ज़हर है”, “दामाद लालची है”। पर सच ये है कि यहां कोई पूरा विलेन नहीं। और यही सबसे बड़ी दिक्कत है।
क्योंकि जब कोई एक सिरे से गलत होता, तो फैसला आसान था। पर यहां कहानी ऐसी है कि जहां लड़का सही खड़ा है, वहां लड़की गलत कदम उठा लेती है। जहां लड़की सौ फीसदी सच्ची है, वहां लड़का चूक जाता है। जहां सास-ससुर ने दिल खोलकर बहू को बेटी बनाया, वहां बेटा बहु ही मां-बाप को भूल गए। और जहां बेटा मां-बाप के लिए जान देने को तैयार है, वहां सास ने बहू का जीना हराम कर रखा है। हर घर में कोई न कोई किरदार ग्रे है। पूरा काला कोई नहीं, पूरा सफेद भी कोई नहीं।
1. जब लड़का सही है, लड़की गलत
रोहन सुबह 9 बजे निकलता है, रात 10 बजे घर आता है। दिन भर दिमाग खपाने की जॉब, टारगेट का प्रेशर। घर आकर भी लैपटॉप खोल लेता है। वो चाहता है कि बीवी समझे। पर नेहा का सच अलग है। नेहा भी जॉब करती है, पर उसका ऑफिस 6 बजे बंद। वो घर आकर बोर होती है। उसे रोहन से वक्त चाहिए, बात चाहिए, वीकेंड पर घूमना चाहिए।
यहां रोहन गलत नहीं – उसकी जॉब के प्रेशर ज्यादा है, वो घर चला रहा है। पर नेहा भी गलत नहीं – उसने लव मैरिज की थी ‘साथ’ के लिए, एक अच्छे कमाने वाले जीवन साथी के लिए।पर दोनों चीजें एक साथ रोहन के लिए थोड़ी मुश्किल हैं। वक्त होगा तो पैसा कम होगा, पैसा होगा तो वक्त कम। वो जब कहती है “तुम्हें मेरी परवाह ही नहीं”, तो रोहन को लगता है “इतना करता हूँ, फिर भी एहसान-फरामोश”।
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गलती किसी की नहीं, पर टूट दोनों रहे हैं। रोहन को लगता है बीवी सपोर्टिव नहीं, नेहा को लगता है पति इमोशनल नहीं।
2. जब लड़की सही है, लड़का गलत
रिया ने अरेंज मैरिज की। ससुराल में सास बीमार, ससुर रिटायर्ड। रिया ने 1 साल में ही घर संभाल लिया। नौकरी छोड़ दी। सास की दवाई, ससुर का खाना, पति का टिफिन। सब परफेक्ट। पर अमित? अमित को ये ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ लगने लगा।
दोस्तों के साथ देर रात तक पार्टी, संडे को भी क्रिकेट। प्रिया जब कहती है “एक दिन तो घर पर रुको”, तो अमित का जवाब, “तुम करती ही क्या हो दिनभर? मैं तो कमाकर लाता हूँ”।
यहां प्रिया सौ टका सही है – उसने अपना करियर कुर्बान किया। पर अमित को लगता है ‘कमाना’ सबसे बड़ा काम है। वो भूल गया कि घर प्रिया चला रही है, तभी वो बाहर चैन से कमा पा रहा है। यहां लड़का गलत है, पर वो खुद को विक्टिम समझता है – “मेरी कोई कदर नहीं”।
3. जब सास-ससुर देवता हैं, बेटा नालायक
मीरा आंटी ने बहू अंजलि को पहले दिन से बेटी कहा। अंजलि मायके जाती तो मीरा आंटी खुद पैकिंग करतीं। अंजलि लेट उठे तो चाय बेड पर। पर उनका बेटा करण? शादी के 6 महीने बाद ही अलग घर ले लिया। कारण? मम्मी हर बात में दखल देती है।
असल में मीरा आंटी दखल नहीं देती थीं, केयर करती थीं। पर करण को आजादी चाहिए थी। बीवी की हर शिकायत पर मां-बाप को गलत ठहरा दिया। आज मीरा आंटी और अंकल अकेले हैं, बीमार हैं। बेटा महीने में एक बार फोन कर देता है। यहां सास-ससुर फरिश्ते, बेटा मतलबी।
4. जब बेटा श्रवण कुमार है, सास-ससुर धृतराष्ट्र
विपरीत देखो। विकास अपनी मां के कहने पर उठता-बैठता है। मां ने कहा “बहू को मायके मत भेजो”, तो बस। पत्नी कविता रो-रोकर बीमार हो गई, पर विकास की हिम्मत नहीं कि मां के सामने खड़ा हो। सास हर बात में ताना – “मेरे बेटे को फंसा लिया”, “दहेज कम लाई”।
यहां बेटा अच्छा है – मां की इज़्ज़त करता है। पर वही अच्छाई जब आंख बंद करके ‘हां’ में बदल जाए, तो ज़हर बन जाती है। यहां सास गलत, और बेटे की ‘अच्छाई’ ही घर तोड़ रही है। कविता गलत नहीं, पर वो अब विकास से भी नफरत करने लगी है।
5. वो लव मैरिज जहां सिर्फ ‘लेना’ है, ‘देना’ कुछ नहीं
अब एक और चेहरा देखिए लव मैरिज का। नेहा पढ़ी-लिखी है, लाखों कमाती है। उसने मोहब्बत करके आदित्य से शादी की। आदित्य भी अच्छा कमाता है, केयरिंग है। सास-ससुर 68 और 70 के हैं। रिटायरमेंट के बाद भी सुबह 6 बजे उठते हैं। सास घुटनों और कंधों के दर्द के बावजूद आटा गूंथती है, ससुर दूध, सब्जी लाते हैं, दो साल के पोते को भी दिन में कई बार खेल में लगा लेते हैं। ताकि उसके माता पिता अपने ऑफिस जा सकें। पौधों को पानी दे देते हैं। घर के कई छोटे छोटे काम वही कर लेते हैं।
नेहा ये सब देखती है। रोज़ देखती है। पर उसके दिमाग में एक ही स्क्रिप्ट चलती है: “मैं हाउसवाइफ नहीं हूं। मैंने और आदित्य ने कमाने के लिए शादी की है, बर्तन मांजने के लिए नहीं। मैं ऑफिस में बॉस हूं, इतना कमाती हूं। घर में नौकर क्यों बनूं? मेरा पति कमाता है, मैं कमाती हूं। हमें खुश रखना उसका काम है – घुमाए, फिराए, रोमांस करे। और ये बुजुर्ग? ये घर में हैं तो इन्हें करना पड़ेगा। इन्होंने अपनी जवानी में किया है, अब भी कर सकते हैं। इन्ह आदत है मैने ये सब कभी नहीं किया।
यहां तक कि 3 साल का बेटा रोए तो नेहा बोल देती है, “मम्मीजी, देख लो इसे। मेरी मीटिंग है।” रात को बेटा बुखार में तपे तो आदित्य ऑफिस से आकर भी उसे संभालता है, सास दिनभर उसे संभालती है, पर नेहा उसकी जिम्मेदारी भी पूरी तरह दूसरों पर डालकर बचना चाहती है, मुझे ऑफिस का बहुत काम है। डिस्टर्ब मत करना।
घर बना ऑफिस, रिश्ते बन गए ‘उम्मीदों का बोझ’
नेहा ने घर को कॉरपोरेट ऑफिस बना दिया है। यहां इमोशन की जगह ‘शर्तें’ चलती हैं। हर रिश्ते पर उसने एक उम्मीद का बोझ लाद दिया है।
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1. पति पर उम्मीदों का बोझ
महीने में 2 बार घुमाने ले जाओ, रोज ‘आई लव यू’ बोलो, सैलरी का आधा मेरे शौक पर खर्च करो, मेरे मायके की हर बात में ‘हां’ कहो। अगर एक भी बोझ नहीं उठाया तो ताना – “तुम्हें मेरी फिक्र ही नहीं।”
2. सास-ससुर पर उम्मीदों का बोझ
सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना, बच्चे की देखभाल, घर की सफाई। बूढ़ी हड्डियों पर इतना बोझ लाद दिया कि वो झुक गए। अगर थककर एक दिन कह दें बेटा आज तबीयत ठीक नहीं, तो सब नाटक लगता है। डॉक्टर तक ले जाना तो दूर हाल पूछना भी जरूरी नहीं लगता।
3. खुद की डिमांड
सिर्फ ‘मुझे खुश रखो’। कैसे रखोगे? ये वाला बोझ सबके सिर पर है, मेरा प्रॉब्लम नहीं।
आदित्य पिस रहा है। ऑफिस में जॉब का प्रेशर, घर में बीवी के लादे हुए उम्मीदों का बोझ। मां-बाप चुप हैं। क्यों? “बेटे का घर न टूट जाए”। 70 साल का बाप सब्जी का थैला उठाकर लाता है, सोचता है बहु बेटे को इस सब जिम्मेदारियों का बोझ न दूं। 68 साल की मां बुखार में भी किचन में खड़ी है, सोचती है नहीं करूं तो बहु बेटा परेशान होंगे ।
और नेहा? उसे सब मिला है – कमाऊ पति, काम करने वाले सास-ससुर, नौकर की तरह ट्रीट करने की आज़ादी, बच्चा संभालने की ज़िम्मेदारी से छुट्टी। पर वो खुश नहीं। क्योंकि उसने घर में ऑफिस की पॉलिटिक्स शुरू कर दी है। आज सास से बोलेगी,आपने मेरे हस्बैंड को भड़काया, कल पति से, तुम्हारी मां मुझे नीचा दिखाती है। खुद ही उम्मीदों का बोझ लादो, फिर खुद ही कहो, देखो मैं कितना निभा रही हूं।
यहां कौन गलत है? सब थोड़ा-थोड़ा। कोई पूरा नहीं।
1. नेहा गलत है? हां।
आत्मनिर्भरता का मतलब संवेदनहीनता नहीं होता। बुजुर्गों के कांपते हाथ देखकर भी उम्मीदों का बोझ बढ़ाते जाना, अपने बच्चे की जिम्मेदारी भी खुद न उठाना – ये हक नहीं, अहंकार है।
2. आदित्य गलत है? हां।
शांति के नाम पर बीवी के लादे हुए हर उम्मीद का बोझ उठा लेना प्यार नहीं, कमजोरी है। मां-बाप को नौकर बनते देखकर चुप रहना बेटे का धर्म नहीं।
3. सास-ससुर गलत हैं? थोड़ा।
घर न टूटे के डर से उम्मीदों का बोझ अपनी कमर पर लाद लेना भी गलत है।
तो गलती किसकी? सबकी। और किसी की नहीं।
यही तो पेंच है। लव मैरिज वाली अंजलि कमाती है, इंडिपेंडेंट है। ये उसकी खूबी है। पर जब वो थके हुए पति से कहती है, मैं तेरी नौकर नहीं, खाना खुद बना,या अपनी मां से बनवा तो ये खूबी घमंड बन जाती है। वो भूल जाती है कि रिश्ता हक से नहीं, एहसास से चलता है।
अमित कमाता है, ये उसकी ज़िम्मेदारी है। पर जब वो बीवी के त्याग को ‘तुम करती ही क्या हो’ बोलकर ज़ीरो कर देता है, तो उसकी कमाई गाली लगती है।
सास मीरा आंटी केयर करती हैं, ये उनका बड़प्पन है। पर जब वही केयर कंट्रोल’ बन जाए, बहू जीन्स मत पहनो, तो बेटा-बहू दूर भागते हैं।
और बेटा करण? उसे प्राइवेसी चाहिए, ये हक है। पर मां-बाप को बुढ़ापे में अकेला छोड़ देना हक नहीं, गुनाह है।
चाबी: 10-10 परसेंट सब झुक जाएं
घर कोई कोर्ट नहीं जहां जज बैठकर फैसला सुनाए कि गलती इसकी 80%, उसकी 20% । घर मंदिर है। और मंदिर में सब झुकते हैं।
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1. लड़के सुनो
बीवी का कमाना एहसान नहीं, पार्टनरशिप है। वो थकती है तो तुम किचन में जाओ। मर्दानगी बर्तन धोने से कम नहीं होती। खाना बनाना तुम भी सीखो अब तक नहीं किया तो अब कर लो। और हां, मां जरूरी है, पर बीवी भी। बैलेंस सीखो। कभी मां गलत हो तो प्यार से ‘ना’ कहना भी बेटे का फर्ज है। और कभी पत्नी गलत हो तो उसे भी उसकी गलती बताना भी गलत नहीं।
2. लड़कियां सुनो
आत्मनिर्भर बनो, घमंडी नहीं। घर का काम करना गुलामी नहीं। अगर पति महीने में 25 दिन कमाता है, तुम 5 दिन उसके लिए खाना बना दोगी तो तुम्हारा क्राउन नहीं गिरेगा। और सास से हर बात में लड़ना जरूरी नहीं। वो 30 साल से घर चला रही है, थोड़ा एक्सपीरियंस इज़्ज़त मांगता है।खाना बनाना कोई छोटा काम नहीं ये लाइफ जीने के एक स्किल है जो हर किसी को आना ही चाहिए नहीं सीखा तो सीख लो। क्योंकि इंसान जीवन भर कुछ न कुछ सीखता ही है। और ये काम हर किसी को आना चाहिये। राजकुमारी बनने के लिए सबको नौकर बनाना जरूरी नहीं।
3. सास-ससुर सुनो
बहू बेटी है, पर ‘रोबोट’ नहीं। उसे सांस लेने दो। तुम्हारे ज़माने में जो हुआ, जरूरी नहीं आज भी हो। सलाह दो, आदेश नहीं। और अगर बेटा-बहू अलग होना चाहें, तो इमोशनल ब्लैकमेल मत करो। आशीर्वाद दो,बुरा मत कहो।उन्हें अलग रहकर खुद की जिंदगी खुद संभालने के मौका दो।
4. बहू के मायके वाले सुनो
दामाद को हर बात पर कमियां गिनाना बंद करो। वो अगर बीवी की इज़्ज़त कर रहा है, किचन में हाथ बंटा रहा है, उसकी हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश कर रहा है। तो उनके मामलों में दखल मत दो। कुछ बातें उन्हें आपस में भी सुलझाने दो। हां अगर लड़की लड़की पर अत्याचार कर रहा है उसके साथ घरेलू हिंसा कर रह है तो बिल्कुल चुप मत रहो। बेटी के साथ दो।
इलाज क्या है? 10% वाला फॉर्मूला
1. नेहा जैसी बहुओं के लिए
कमाना तुम्हारी ताकत है, पर ‘घर संभालना’ कमजोरी नहीं। सास के सिर से उम्मीदों का बोझ उतारकर एक बार उनके लिए चाय बना दो। उनके चेहरे की चमक तुम्हारी सैलरी से बड़ी होगी। ‘हाउसवाइफ’ गाली नहीं, ‘होममेकर’ ताज है। कभी उनकी तबियत देखकर उन्हें आराम करने को खुद कहो। डॉक्टर के पास ले जाओ।थोड़ी देर साथ बैठकर उनके मन की बात कर लो। कुछ घट नहीं जाएगा।
2. आदित्य जैसे पतियों के लिए
बीवी से मोहब्बत करो, उसके उम्मीदों के बोझ के नीचे दबो नहीं। ‘ना’ कहना सीखो। जिस दिन तुम मां-बाप के कंधे से बोझ उतारोगे, बीवी खुद-ब-खुद समझ जाएगी।
3. सास-ससुर के लिए
त्याग की भी लिमिट होती है। हर बार झुककर उम्मीदों का बोझ ढोना बंद करो। बहू को बेटी कहो, पर बेटी को गलती पर टोका भी जाता है।
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आखिरी बात: कोई परफेक्ट नहीं
लगभग हर रिश्ते में 40% मिठास है, 60% एडजस्टमेंट। जो ये 60% करने को तैयार है, उसका घर बचता है। जो कहता है, मैं क्यों झुकूं, उसका घर कोर्ट-कचहरी में बंट जाता है।
याद रखो, अरेंज हो या लव, शादी दो परफेक्ट लोगों का मिलन नहीं है। ये दो इम्परफेक्ट लोगों का फैसला है कि “चल, एक-दूसरे के इम्परफेक्शन के साथ खूबसूरत जिएंगे”।
जहां लड़का गलत है, वहां लड़की माफ कर दे। जहां लड़की गलत है, वहां लड़का गले लगा ले। जहां सास गलत है, वहां बेटा समझाए। जहां बेटा गलत है, वहां मां डांट दे।
क्योंकि अगर हर कोई सोच ले कि “गलती सिर्फ सामने वाले की है”, तो अंत में बचता क्या है? दो ईगो, चार टूटे दिल, और कुछ सहमे हुए बच्चे जो सीख जाते हैं कि ‘शादी’ नाम की चीज़ में प्यार नहीं होता। शादी मतलब बर्बादी।
तो प्लीज़, 100% सही होने की ज़िद छोड़ दो। 10% तुम झुको, 10% वो झुके। बाकी 80% ज़िंदगी खुद-ब-खुद हसीन हो जाएगी। क्योंकि घर ‘जीता’ नहीं जाता, ‘बसाया’ जाता है। और बसाने के लिए आपस में टकराती हुई ईंटें नहीं, एक दूसरे से जुड़े हुए दिल चाहिए।
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लेखिका
आर. जे. रेखा क्रिस्टल वॉइस
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