
आकाशवाणी FM Gold 100.1RJ REKHA
पिछले बीस साल में हमने एक क्रांति देखी है। बेटियों के हाथ में किताबें थमाईं, कंधे पर बस्ता टाँगा, पैरों में हौसले के जूते पहनाए। हमने नारा दिया — बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ। और बेटी सचमुच बच गई, पढ़ गई, उड़ गई। आज वो मंगल पर रॉकेट भेज रही है, कोर्ट में जज की कुर्सी पर बैठ रही है, ओलंपिक में तिरंगा लहरा रही है। हमने बेटी को उड़ना सिखा दिया। खुद बाइक चलाती है। यहां तक ट्रक, रिक्शा,ऑटो से लेकर लड़ाकू विमान तक उड़ाती है।धरती से लेकर अंतरिक्ष तक परचम लहराती है।विश्व रिकॉर्ड बनाती है।
पर ठहरिए। ये आधी कहानी है। क्योंकि वही बेटी जब शाम को घर लौटती है तो बस का रास्ता बदल लेती है। वही बेटी जब दफ्तर में प्रमोशन पाती है तो लोग उसकी मेहनत की जगह उसकी ईमानदारी पर सवाल उठाते हैं। वही बेटी जब शादी के बाद अपने सपने पूरे करना चाहती है तो ससुराल कहता है “बहुत उड़ने लगी है, दबा कर रखो, पर थोड़े कतर कर रखो।
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सवाल ये है — हमने बेटी को उड़ना तो सिखा दिया, पर बेटे को क्या सिखाया?
- पिंजरा कौन बना रहा है?
एक लड़की को पैदा होने से पहले ही मार देने वाले हाथ किसके थे? दहेज के लिए जलाने वाली माचिस किसने जलाई? एसिड फेंकने वाले, पीछा करने वाले, दफ्तर में गलत तरीके से छूने वाले, राह चलते फब्तियां कसने वाली ज़ुबान किसकी है। लड़कियां अपने लिये लड़ने लगी तो गैंग में आकर उनकी बर्बादी की कहानी लिखने वाले हाथ किसके हैं?
जवाब कड़वा है, पर सच है — ज्यादातर बार ये हाथ बेटों के हैं। हमारे बेटों के।
हमने बेटी को कराटे सिखाया ताकि वो खुद को बचा सके। पर हमने बेटे को ये क्यों नहीं सिखाया कि लड़की कोई टारगेट नहीं होती? हमने बेटी को अपने साथ पैपर स्प्रे रखना सिखाया। पर बेटे को ये क्यों नहीं सिखाया कि रात में अकेली जाती लड़की की इज्जत करना उसकी मर्दानगी है, कमजोरी नहीं? हमने समस्या का इलाज नहीं किया, हमने बेटी को ही कवच पहना दिया। पिंजरा बनाने वाले को खुला छोड़ दिया और पंछी से कहा -खुद को बचाओ।
- परवरिश का अधूरा सिलेबस
घरों में देखिए। बेटी से कहते हैं – बैठना सीखो, बोलना सीखो, सहना सीखो, घर बसाना सीखो। बेटे से कहते हैं — तू तो लड़का है, तू ये लड़कियों वाले काम करेगा?
बेटी की गलती पर पूरा खानदान शर्मिंदा होता है। बेटी का दुपट्टा हटा तो पूरे खानदान की इज्जत ले उड़ा। इज्जत की जिम्मेदार सिर्फ बेटी को बना दिया। बेटे की गलती पर हमने क्या कहा “लड़के हैं, हो जाती है गलती”। लड़की को अकेले घर से बाहर देर रात में नहीं रहना चाहिए था ।
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मां बाप को पूछना चाहिए था कहां घूम रही है। यही वो पहली कैंची है जो किसी के पंख कतरने का हौसला देती है। क्योंकि हमने बेटियों के बाहर रहने का समय तय किया पर बेटों का नहीं।बेटियों के कंधों पर खानदान की इज्जत बचाए रखने की जिम्मेदारी तो डाल दी पर बेटों को ये जिम्मेदारी सिखाना भूल गए। गलत बेटा हुआ तो भी सवाल बेटी से हुआ। कीचड़ बेटी पर उछला।
जब चार साल का बेटा अपनी बहन का खिलौना छीनता है तो हम हँसकर कहते हैं “देदो वो नहीं मानेगा बहुत गुस्से वाला है”। जब वही बेटा सोलह साल का होकर किसी लड़की का दुपट्टा खींचता है तो हम कहते हैं “उम्र ही ऐसी है”। हम भूल जाते हैं कि गुस्सा, ज़िद और दरिंदगी के बीच सिर्फ एक लाइन का फासला होता है, और वो लाइन हम खुद मिटाते हैं।
बेटे को रसोई में घुसने नहीं दिया, कहा – ये लड़कियों का काम है। नतीजा? कल को वही बेटा अपनी पत्नी से उम्मीद करेगा कि वो नौकरी भी करे, घर भी संभाले, बच्चे भी पाले और उसके सारे काम भी करे। क्योंकि हमने उसे हिस्सेदारी नहीं हुकूमत सिखाई।
- इज्जत का ठेका सिर्फ बेटी के नाम क्यों?
किसी घर की इज्जत बेटी के कपड़ों से तय होती है, बेटे के किरदार से नहीं। लड़की ने जींस पहनी तो खानदान की नाक कट गई। लड़के ने शराब पीकर गाड़ी ठोक दी, किसी को छेड़ दिया — जवान खून है, जोश में हो गया।
ये दोहरा मापदंड ही सबसे बड़ा पाप है। जब तक इज्जत का बोझ सिर्फ बेटी के कंधों पर रहेगा, बेटे बेलगाम रहेंगे। जिस दिन घर की इज्जत बेटे की नजरों से, उसकी जुबान से, उसके हाथों से तय होने लगेगी, उस दिन आधे अपराध वैसे ही खत्म हो जाएंगे।
एक पिता अपनी बेटी से कहता है “बेटा, किसी से डरना मत”। बहुत अच्छा। पर क्या वही पिता अपने बेटे से कहता है -बेटा, किसी को डराना मत? शायद नहीं। यहीं हम चूक जाते हैं।
- मर्दानगी की नई परिभाषा गढ़नी होगी।
हमें अपने बेटों को बताना होगा कि असली मर्द वो नहीं जो आवाज ऊँची करके बात मनवाए। असली मर्द वो है जो औरत की “ना” को “ना” समझे। असली मर्द वो नहीं जो भीड़ में लड़की पर कमेंट पास करे। असली मर्द वो है जो भीड़ में किसी को ऐसा करने से रोके।
बेटे को सिखाओ कि रसोई में खाना बनाना, अपनी शर्ट खुद इस्त्री करना, अपने आँसू छुपाना नहीं, बल्कि इंसान होना मर्दानगी है। बेटे को सिखाओ कि ताकतवर वो है जो कमजोर को दबाए नहीं, ऊंचा उठाए।
जब एक लड़का अपनी बहन को स्कूटी सिखाता है तो वो जिम्मेदार भाई बनता है। जब वही लड़का राह चलती अनजान लड़की का पीछा करता है तो वो गुनहगार बन जाता है। फर्क सिर्फ सोच का है। और सोच घर से बनती है।
- अब बेटे को क्या सिखाएं? — 5 सीधी बातें।
- ना का मतलब ना होता है।
- चाहे वो हंसी में कही गई हो, मैसेज पर लिखी हो, या आधी रात को तुम्हारी पत्नी द्वारा ही बोली गई हो। ना का मतलब सिर्फ ना है। उसमें अपनी मर्जी मत ढूंढो।
- घर का काम जेंडर नहीं देखता। बर्तन, खाना, झाड़ू- ये लिविंग स्किल हैं, सजा नहीं। जो बेटा अपनी मां का हाथ बंटाता है, वो कल अपनी पत्नी का साथी बनेगा, मालिक नहीं।
- दोस्ती और हक में फर्क है। कोई लड़की तुमसे हंसकर बात कर ले तो वो तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं बन गई। दोस्ती का मतलब दोस्ती है। उसकी मर्जी के बिना उसे छूना, मैसेज करना, पीछा करना, ये सब पंख कतरना है। और न ही तुम उसे परमिशन देने का हक पा गए। वो अपनी जिंदगी खुद चलाना जानती है तुम उसके ठेकेदार मत बनो।मदद करो तो हकदार मत बनो।
- गुस्सा जुबान पर नहीं, कंट्रोल में रखो मर्दानगी हाथ उठाने में नहीं, हाथ रोक लेने में है। अगर गुस्सा आए तो कमरे से बाहर चले जाओ, पर किसी पर, खासकर किसी औरत पर हाथ मत उठाओ।
- गलत को गलत कहो।
तुम्हारा दोस्त किसी लड़की पर कमेंट करे तो चुप मत रहो। उसे टोको क्योंकि जो गलत का विरोध नहीं करता, वो भी गुनाह में शामिल होता है। और हिस्सेदार माना जाता है।
आखिरी बात — पाप और पुण्य का हिसाब।
हम मंदिर जाते हैं, पाप-पुण्य का हिसाब रखते हैं। मानते हैं कि जीव हत्या पाप है। तो फिर सपनों की हत्या पुण्य कैसे हो गई? किसी की उड़ान रोकना, उसके पंख कतरना — ये भी हत्या ही है। हौसलों की हत्या। अरमानों की हत्या। एक मायने में किसी की आत्मा की हत्या।
बेटी को उड़ना सिखाकर हमने पुण्य कमाया। अब बेटे को पंख ना कतरना सिखाकर हमें उस पुण्य को बचाना है। वरना एक दिन समाज का बैलेंस बिगड़ जाएगा। एक तरफ पढ़ी-लिखी, कामयाब, पर डरी हुई औरतें होंगी। दूसरी तरफ कुंठित, गुस्सैल, अकेले मर्द होंगे।
वो समाज तरक्की नहीं करेगा जहाँ आधा आसमान डर के पिंजरे में कैद हो।
इसलिए आज, अभी, इसी वक्त से शुरुआत कीजिए। अपने बेटे को पास बैठाइए। उसकी आंखों में देखकर कहिए — बेटा, तेरी बहन, तेरी दोस्त, तेरी पत्नी, तेरी बेटी — सबको उड़ने का हक है। और अगर तूने कभी किसी के पंख कतरने की कोशिश की, तो तू इंसान कहलाने के लायक नहीं रहेगा।”
क्योंकि याद रखिए — बेटी को उड़ना सिखाना आधा काम था। पूरा काम तब होगा जब बेटा पंखों की इज्जत करना सीख जाएगा।
और जिस दिन हर घर का बेटा ये सीख जाएगा, उस दिन किसी बेटी को कराटे सीखने की जरूरत नहीं पड़ेगी, पेपर स्प्रे रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी, रात को डरने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
उस दिन सचमुच आसमान सबका होगा। और उसमें पंख फैलाकर उड़ने का हक भी सबका होगा।

