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संगरोली में 45वीं रामलीला, श्रीराम के आदर्शों से मिलेगा संस्कारों का संदेश

पितृ आज्ञा पालन, भ्रातृ प्रेम, त्याग और मर्यादा के प्रसंगों का होगा मंचन, युवा पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का प्रयासपूंडरी। पूंडरी विधानसभा क्षेत्र के गांव संगरोली में इस वर्ष 45वीं रामलीला का आयोजन किया...

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संगरोली में 45वीं रामलीला, श्रीराम के आदर्शों से मिलेगा संस्कारों का संदेश

पितृ आज्ञा पालन, भ्रातृ प्रेम, त्याग और मर्यादा के प्रसंगों का होगा मंचन, युवा पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का प्रयास

पूंडरी। पूंडरी विधानसभा क्षेत्र के गांव संगरोली में इस वर्ष 45वीं रामलीला का आयोजन किया जा रहा है। रामलीला को लेकर ग्रामीणों में उत्साह का माहौल है। आयोजन के दौरान भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र और उनकी लीलाओं का मंचन कर समाज को संस्कार, मर्यादा, त्याग, भाईचारे और कर्तव्यनिष्ठा का संदेश दिया जाएगा।

रामलीला के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से युवा पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। आयोजन में भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े ऐसे प्रसंगों का मंचन किया जाएगा, जो परिवार, समाज और व्यक्ति के कर्तव्यों की प्रेरणा देते हैं।

45वीं बार रामलीला का आयोजन गौरव की बात

आचार्य सुदामा शास्त्री संगरोली ने बताया कि गांव में लगातार 45वीं बार रामलीला का आयोजन होना अपने आप में गौरव की बात है। उन्होंने कहा कि रामलीला केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज को अच्छे संस्कार और आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम के जीवन से प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करने, बड़ों का सम्मान करने तथा परिवार और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाने की प्रेरणा मिलती है।

पिता की आज्ञा को सर्वोपरि मानकर स्वीकार किया वनवास

आचार्य सुदामा शास्त्री ने कहा कि भगवान श्रीराम को आदर्श पुत्र के रूप में देखा जाता है। जब उनके पिता महाराजा दशरथ ने उन्हें 14 वर्ष का वनवास जाने की आज्ञा दी, तो श्रीराम ने पिता के आदेश को सर्वोपरि मानते हुए बिना विरोध के वनवास स्वीकार कर लिया।

उन्होंने राजपाट और सुख-सुविधाओं का त्याग कर पिता की आज्ञा का पालन किया। श्रीराम का यह चरित्र आज भी समाज के लिए पितृ सम्मान और संस्कारों की मिसाल माना जाता है।

रामलीला से मिलेगा भ्रातृ प्रेम और त्याग का संदेश

आचार्य सुदामा शास्त्री ने कहा कि रामलीला के माध्यम से भ्रातृ स्नेह और त्याग का भी संदेश मिलता है। भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के बीच प्रेम और समर्पण परिवार में आपसी भाईचारे की प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि श्रीराम का जीवन यह भी सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी व्यक्ति को अपने सिद्धांतों और मर्यादाओं से समझौता नहीं करना चाहिए।

न्याय, कर्तव्य और अनुशासन की भी मिलेगी सीख

उन्होंने कहा कि रामलीला में भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों के साथ राजनीति के आदर्श गुण, न्याय, कर्तव्य, अनुशासन, सत्य और धर्म का संदेश भी लोगों तक पहुंचाया जाता है।

वर्तमान समय में युवा पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ना जरूरी है। ऐसे में धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

आचार्य सुदामा शास्त्री ने क्षेत्र के लोगों से रामलीला में अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर कलाकारों का उत्साह बढ़ाने की अपील की। उन्होंने लोगों से भगवान श्रीराम के आदर्शों को केवल मंच तक सीमित न रखते हुए उन्हें अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेने का आह्वान किया।

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