पंजाब एवं हरियाणा High Court ने पेंशन में देरी के एक गंभीर मामले में सख्त रुख अपनाते हुए रक्षा सचिव और सेना प्रमुख पर ₹2 लाख का जुर्माना लगाया है। अदालत ने यह कदम एक सेवानिवृत्त मेजर को दिव्यांगता पेंशन देने में लगातार देरी और न्यायालय के आदेशों की अनदेखी के चलते उठाया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि न्यायिक आदेशों का पालन करना अनिवार्य है और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
पुणे निवासी रिटायर्ड मेजर से जुड़ा मामला
यह मामला पुणे निवासी रिटायर्ड मेजर राजदीप दिनकर पंडेरे से जुड़ा है, जिन्होंने भारतीय सेना में सेवा के दौरान गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना किया। वर्ष 2012 में सेना में शामिल हुए मेजर पंडेरे को लद्दाख स्काउट्स में तैनात किया गया था, जहां उन्होंने कठिन परिस्थितियों में सेवा दी।
साल 2017 में ड्यूटी के दौरान उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। इसके बाद उन्हें दिल्ली स्थित सैन्य अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां जांच में एक गंभीर बीमारी की पुष्टि हुई। इस बीमारी के चलते उनका ऑपरेशन किया गया और उन्हें लो मेडिकल कैटेगरी में डाल दिया गया। आने वाले वर्षों में उनकी स्थिति और जटिल होती गई और उन्हें कई बार मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होना पड़ा। इस दौरान उनकी कुल 24 सर्जरी तक की गईं।
सितंबर 2022 में मेडिकल बोर्ड ने उन्हें सेवा से मुक्त करने की सिफारिश की। हालांकि, उनकी दिव्यांगता केवल 15 प्रतिशत आंकी गई और इसे सैन्य सेवा से असंबंधित बताया गया। इसी आधार पर उनकी दिव्यांगता पेंशन की मांग को खारिज कर दिया गया।
इस फैसले के खिलाफ मेजर पंडेरे ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण का रुख किया। ट्रिब्यूनल ने मामले की सुनवाई के बाद पाया कि पहले के मेडिकल रिकॉर्ड में उनकी बीमारी को सेवा से जुड़ा माना गया था। ऐसे में अंतिम मेडिकल बोर्ड के निष्कर्ष को गलत ठहराते हुए ट्रिब्यूनल ने उनकी दिव्यांगता 40 प्रतिशत मानने का निर्देश दिया, जिसे नियमों के तहत 50 प्रतिशत तक बढ़ाया गया। साथ ही जुलाई 2022 से उन्हें आजीवन दिव्यांगता पेंशन देने का आदेश दिया गया।
इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों ने आदेश का पालन नहीं किया। केंद्र सरकार द्वारा दायर याचिका को हाईकोर्ट ने पहले ही खारिज कर दिया था और स्पष्ट किया था कि पेंशन का अधिकार पूरी तरह स्थापित है। लेकिन इसके बाद भी पेंशन जारी नहीं की गई, जिससे मजबूर होकर मेजर पंडेरे को अवमानना याचिका दाखिल करनी पड़ी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अधिकारियों ने बार-बार दिए गए निर्देशों की अनदेखी की है। कोर्ट ने पहले ही चेतावनी दी थी कि आदेश का पालन नहीं होने पर जुर्माना लगाया जाएगा। जब तय समयसीमा के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो अदालत ने सख्त कदम उठाते हुए ₹2 लाख का जुर्माना लगाने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यह राशि रक्षा सचिव और सेना प्रमुख के वेतन से बराबर-बराबर काटी जाए और डिमांड ड्राफ्ट के जरिए याचिकाकर्ता को दी जाए। साथ ही अधिकारियों को अंतिम अवसर देते हुए अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा गया है।
यह फैसला साफ संदेश देता है कि न्यायालय के आदेशों की अनदेखी करने पर उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों को भी जवाबदेह ठहराया जाएगा और पेंशन जैसे संवेदनशील मामलों में लापरवाही बिल्कुल स्वीकार नहीं की जाएगी।

