Supreme Court का प्रोपर्टी को लेकर बड़ा फैसला, पिता की संपत्ति में बेटियों के अधिकार होंगे मजबूत

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    Supreme Court का प्रोपर्टी को लेकर बड़ा फैसला, पिता की संपत्ति में बेटियों के अधिकार होंगे मजबूत

    Supreme Court : देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने पिता की संपत्ति में बेटियों के अधिकार को लेकर एक अहम और स्पष्ट फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि यदि परिवार में बेटों ने आपस में संपत्ति का बंटवारा (division of property) कर लिया हो, तब भी इससे पिता की संपत्ति पर बेटियों का अधिकार समाप्त नहीं होता।

    यह निर्णय उन बेटियों के लिए बड़ी राहत और जीत माना जा रहा है, जिन्हें अक्सर पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे के दौरान उनके हक से वंचित कर दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट (supreme court decision) ने साफ किया है कि कानून की नजर में बेटियों का अधिकार (Daughters’s Right) पूरी तरह सुरक्षित और बराबर रहेगा।

    कोर्ट ने कही ये बात
    इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने समाज को एक सख्त और स्पष्ट संदेश दिया। अदालत ने कहा कि यदि किसी पिता की मृत्यु बिना वसीयत (death without will) के होती है, तो उसकी संपत्ति में बेटी को क्लास-1 वारिस के तौर पर पूरा और समान अधिकार मिलेगा।

    भले ही बेटों ने पहले ही आपस में संपत्ति का बंटवारा कर लिया हो, वे इस आधार पर बहनों के कानूनी हक को खत्म नहीं कर सकते। यह अहम फैसला कर्नाटक राज्य से जुड़े एक पुराने पारिवारिक संपत्ति विवाद की सुनवाई के दौरान सुनाया गया।

    आखिर क्या है पिता की संपत्ति से जुड़ा पूरा मामला

    यह पूरा मामला कर्नाटक के निवासी बीएम सीनप्पा की पारिवारिक संपत्ति से जुड़ा है। बीएम सीनप्पा का वर्ष 1985 में बिना कोई वसीयत लिखे निधन हो गया था। उनके पीछे परिवार में पत्नी, तीन बेटियां और चार बेटे रह गए थे।

    मौखिक रूप से कर लिया बंटवारा
    पिता की मृत्यु के बाद चारों बेटों ने पहले आपस में मौखिक रूप से और फिर वर्ष 2000 में एक पंजीकृत दस्तावेज के जरिए पूरी संपत्ति का आपस में बंटवारा कर लिया। हैरानी की बात यह रही कि इस पूरे बंटवारे की प्रक्रिया में तीनों बेटियों को न तो शामिल किया गया और न ही उन्हें संपत्ति में कोई हिस्सा दिया गया।

    बेटियों ने अपने हक के लिए अदालत में क्या दलील रखी
    भाइयों की इस कार्रवाई के बाद वर्ष 2007 में तीनों बेटियों ने न्याय के लिए अदालत का रुख किया। उन्होंने दलील दी कि उनके पिता का निधन बिना वसीयत के हुआ था, इसलिए कानून के तहत वे भी पिता की संपत्ति (father’s property) में बराबर की हिस्सेदार हैं और उन्हें उनके वैध अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

    दूसरी ओर भाइयों ने अदालत में यह तर्क रखा कि वर्ष 2000 में किया गया संपत्ति का बंटवारा 20 दिसंबर 2004 से पहले ही हो चुका था, इसलिए कानून की धारा 6(5) के तहत यह बंटवारा वैध और सुरक्षित है। इसी दलील को स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेटियों की याचिका को खारिज कर दिया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को क्यों गलत माना

    सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के पुराने फैसले को पूरी तरह गलत करार दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून की धारा 6(5) का उद्देश्य केवल उन बंटवारों को 2005 के संशोधित कानून के प्रभाव से बचाना है, जो उस तारीख से पहले विधिवत पूरे हो चुके हों। इसका यह अर्थ कतई नहीं निकाला जा सकता कि बेटियों का स्वतंत्र और समान उत्तराधिकार का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो जाए।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि बेटी का अधिकार केवल जन्म से मिलने वाले कॉपार्सनरी अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने पिता की संपत्ति में क्लास-1 उत्तराधिकारी के रूप में भी पूर्ण और समान हिस्से की हकदार है।

    देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह तय करना कि पुराना बंटवारा वास्तव में वैध है या वह बेटियों पर भी लागू होता है, एक तथ्यात्मक विवाद का विषय है। ऐसे मामलों का फैसला सीधे नहीं किया जा सकता, बल्कि ट्रायल कोर्ट (trial court) में सबूतों और साक्ष्यों की विधिवत जांच के बाद ही किया जाएगा। अदालत ने साफ कहा कि बिना प्रमाणों की पड़ताल किए बेटियों को उनके कानूनी अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

    इन सभी कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अंततः कर्नाटक हाईकोर्ट (Karnataka High Court) के पुराने आदेश को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया, ताकि सभी सबूतों और साक्ष्यों की गहराई से जांच की जा सके। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सख्त निर्देश दिया है कि संपत्ति की वर्तमान स्थिति में किसी भी तरह का कोई बदलाव न किया जाए।

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