लंदन। Meningitis के खतरनाक प्रकोप ने यूनाइटेड किंगडम की स्वास्थ्य व्यवस्था और टीकाकरण नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। University of Kent में फैले संक्रमण के कारण दो छात्रों की मौत हो गई है, जबकि 20 से अधिक छात्र इलाज के तहत हैं।
यह प्रकोप खासतौर पर उस पीढ़ी को प्रभावित कर रहा है, जिसे इस बीमारी के खिलाफ नियमित टीकाकरण नहीं मिला था। यह स्थिति पिछले एक दशक से चली आ रही नीति की खामी को उजागर करती है।
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वैक्सीन होने के बावजूद नहीं मिला संरक्षण
मेनिन्जाइटिस-बी (Meningococcal Group B) से बचाव के लिए Bexsero नामक वैक्सीन 2013 से उपलब्ध है। ब्रिटेन ने 2015 में इसे अपने राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल भी किया था, लेकिन यह सुविधा केवल नवजात शिशुओं तक सीमित रखी गई।
इसका मतलब है कि आज विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले सभी छात्र, जो 2015 से पहले पैदा हुए हैं, इस टीके से वंचित रह गए। सरकार ने इनके लिए कोई कैच-अप (catch-up) कार्यक्रम भी नहीं चलाया, जिससे पूरी एक पीढ़ी बिना सुरक्षा के रह गई।
नीति के पीछे आर्थिक तर्क
ब्रिटेन की वैक्सीनेशन सलाहकार संस्था Joint Committee on Vaccination and Immunisation (JCVI) ने उस समय यह निर्णय लिया था कि इस वैक्सीन का लाभ उसकी लागत के हिसाब से पर्याप्त नहीं है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कई वैक्सीन “हर्ड इम्युनिटी” (सामूहिक प्रतिरक्षा) प्रदान करती हैं, जिससे समाज के अन्य लोगों को भी अप्रत्यक्ष सुरक्षा मिलती है। लेकिन Bexsero केवल उस व्यक्ति को बचाती है जिसे यह दी जाती है और संक्रमण के फैलाव को नहीं रोकती।
इसी कारण JCVI ने इसे व्यापक स्तर पर लागू करने के बजाय केवल शिशुओं तक सीमित रखा।
विश्वविद्यालयों में ज्यादा खतरा
हालांकि, हालिया प्रकोप ने यह दिखाया है कि विश्वविद्यालयों का वातावरण इस संक्रमण के लिए बेहद अनुकूल है। हॉस्टल, भीड़भाड़, नजदीकी संपर्क, पार्टी और सामाजिक गतिविधियां संक्रमण के तेजी से फैलने का कारण बनती हैं।
अध्ययनों के मुताबिक, विश्वविद्यालय के पहले सप्ताह में ही छात्रों में इस बैक्टीरिया के वाहक बनने की दर 7% से बढ़कर 23% तक पहुंच जाती है। कुछ महीनों में यह आंकड़ा 30% से भी अधिक हो सकता है।
अमेरिका के एक अध्ययन में पाया गया कि प्रथम वर्ष के छात्रों में मेनिन्जाइटिस-बी का खतरा सामान्य युवाओं की तुलना में लगभग 12 गुना अधिक होता है।
निजी टीकाकरण और बढ़ती असमानता
जिन परिवारों के पास संसाधन थे, उन्होंने अपने बच्चों को निजी तौर पर यह वैक्सीन लगवाई। लेकिन इसकी कीमत काफी ज्यादा है—एक डोज करीब 110 पाउंड (लगभग ₹11,000) की होती है और दो डोज जरूरी होती हैं।
इससे समाज में असमानता बढ़ी है, क्योंकि हर परिवार यह खर्च नहीं उठा सकता। केंट में प्रकोप के बाद निजी क्लीनिकों में वैक्सीन की मांग 65 गुना तक बढ़ गई है, लेकिन इसका लाभ केवल आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को ही मिल पा रहा है।
आर्थिक आकलन पर फिर से बहस
2021 में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया कि अगर बीमारी के दीर्घकालिक प्रभाव—जैसे इलाज का खर्च, आय का नुकसान और परिवारों पर असर—को शामिल किया जाए, तो इस वैक्सीन का लाभ उसकी लागत से कहीं ज्यादा है।
यानी शुरुआती बचत के लिए लिया गया फैसला भविष्य में ज्यादा महंगा साबित हो सकता है।
सरकार का रुख और आगे की रणनीति
इस प्रकोप के बाद ब्रिटेन के स्वास्थ्य सचिव Wes Streeting ने कहा है कि सरकार वैक्सीन नीति की समीक्षा करेगी और युवाओं को इसमें शामिल करने पर विचार किया जाएगा।
फिलहाल, प्रभावित क्षेत्र में आपातकालीन टीकाकरण और एंटीबायोटिक वितरण अभियान चलाया जा रहा है।
केंट यूनिवर्सिटी में मेनिन्जाइटिस का प्रकोप केवल एक स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि नीति की खामियों का भी संकेत है। यह घटना दिखाती है कि केवल आर्थिक आधार पर लिए गए फैसले कभी-कभी समाज के बड़े हिस्से को जोखिम में डाल सकते हैं।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेती है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

