अच्छी लड़की” का टैग वापस कर दिया: मैं बैडी हूँ। हाँ, मैं अच्छी लड़की नहीं हूँ।
मैं बैडी हूँ। और ये कहने में मुझे ज़रा भी शर्म नहीं आती।
सदियों का हिसाब
सदियों से हमें एक ही सिलेबस पढ़ाया गया।
अध्याय 1: चुप रहो।
अध्याय 2: सह लो।
अध्याय 3: “लड़कियाँ ऐसा नहीं करतीं” अपना मुँह बंद रखो ।
हमारे पैरों में पायल नहीं, बेड़ियाँ पहनाई गईं। हमारे हाथों में कलम नहीं, थाली पकड़ाई गई। हमारे सपनों पर “बदनामी” का स्टाम्प लगा दिया गया। अवसर? वो लड़कों के लिए थे। अधिकार? वो “बाद में” कहकर छीन लिए गये और हर कदम पर हमारे अरमानों का गला घोंट दिया गया।
फिर भी उम्मीद थी कि हम “आदर्श” बनकर सबकी थाली में रोटी परोसेंगे और मुस्कुराएंगे भी।
पिंजरा कब टूटा? टूटा तब जब साँस अटकने लगी थी। टूटा तब जब “लोग क्या कहेंगे” सुनते-सुनते कान पक गए थे।
टूटा तब जब हमें समझ आ गया – जो दरवाज़ा थपकी से नहीं खुल रहा, उसे लात मारनी पड़ेगी और जैसे ही हमने लात मारी, समाज चिल्लाया ज़रा भी शर्म नहीं है, संस्कार नहीं है, हाथ से निकल गई है। बहुत बुरी लड़की है यानी शी इस अ “बैडी!”
Also read : चाय से लेकर चैट तक, बस एक बहस और सब तहस-नहस: क्योंकि हम जीतना चाहते हैं, समझना नहीं
बैडी? ओह अच्छा पर मेरी नज़र में
बैडी होने का मतलब ये नहीं कि मैं बिगड़ी हुई हूँ।
बैडी होने का मतलब है मैं बिगड़ चुके निज़ाम यानी सिस्टम को मानने से मना कर चुकी हूँ।
मैं वो हूँ जो कहती है “ये मेरा शरीर है। मेरे कपड़े, मेरे रूल्स।”
“ये मेरी सैलरी है। किसी को हिसाब दूँ ये ज़रूरी नहीं। “
“ये मेरा टाइम है। रात 12 बजे भी बाहर जाऊंगी, और सुबह 6 बजे काम से भी लौटूंगी।”
“रिश्ता निभाऊंगी, गुलामी नहीं।”
“गलती करूंगी, और उससे सीखकर और तेज़ उड़ूंगी।”
मैं वो हूँ जो शादी में “कन्यादान” शब्द सुनकर पूछती है “मैं सामान हूँ क्या?” मैं वो हूँ जो ब्रेकअप के बाद 3 दिन रोती तो है पर चौथे दिन खुद को संभाल कर फिर अपने लिए एक ठोस कदम आगे बढ़ाती है अपने पांव पर खड़ी होती है। मैं वो हूँ जो कहती है “बच्चे भी संभाल लूंगी, बोर्ड मीटिंग भी।”
Also read : अरेंज हो या लव, जब हर कोई थोड़ा सही, थोड़ा गलत है, तो सज़ा सिर्फ रिश्ते को क्यों?
तुम्हें मिर्ची क्यों लगी? क्योंकि तुम्हें आदत थी हमें झुका देखने की। अब जब हम सीधे खड़े हुए, तो तुम्हारी नज़र नीचे हो गई। तुमने हमें “संस्कारी” के नाम पर पिंजरा दिया था। हमने उस पिंजरे को तोड़कर उसी की सलाखों से अपना ताज बना लिया। अब जब हम बोलते हैं तो तुम्हें “ज़बान लंबी ” लगती है। जब हम कमाते हैं तो तुम्हें “घमंड” लगता है। जब हम अकेले जीते हैं तो तुम्हें “खतरा” लगता है।पर अब फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि हमने भीख माँगना बंद कर दिया। अब हम हक छीन लेते हैं।
ये क्रांति है। ये कोई इंस्टाग्राम फिल्टर नहीं है। ये उस लड़की का खून पसीना है जो गाँव से निकलकर शहर में पीजी में रहती है ऊंची उड़ान के लिए। ये उस माँ का हौसला है जो 40 में ग्रेजुएशन कर रही है। ये उस बहन की हिम्मत है जो भाई के साथ बाइक पर बैठकर कहती है “मैं भी चलाऊंगी”। बैडी कल्चर कोई ट्रेंड नहीं है। ये उन सदियों का जवाब है जहाँ हमें सिर्फ “सेवा” के लिए पैदा किया गया था।
मेरा फाइनल जवाब
हाँ, मैं अच्छी लड़की नहीं हूँ।
मैं बैडी हूँ।
मैं वो हूँ जिसने “इज़्ज़त” के नाम पर अपना गला घोंटना बंद कर दिया। मैं वो हूँ जिसने “परंपरा” के नाम पर अपने सपने बेचने से मना कर दिया। मैं वो हूँ जो गिरकर भी “सॉरी” नहीं बोलेगी, बल्कि उठकर बोलेगी “देख, मैं वापस आ गई”। तुम मुझे जो मर्ज़ी कह लो। नाम दो, ताने दो, बहिष्कार करो। पर एक बात याद रखना – जिस दिन लड़की ने डरना बंद कर दिया, उस दिन इतिहास बदल गया। और वो दिन आ चुका है।
इसलिए अब जब कोई कहे “बैडी है”,तो मैं सीना ठोककर जवाब दूंगी -“हाँ हूँ। और यही मेरी पहचान है। क्योंकि अब मैं जीती हूँ, झेलती नहीं”।
.webp)
.webp)



Leave a Reply