रक्षाबंधन का मतलब आज तक हमने एक ही सुना है – बहन भाई की कलाई पर राखी बांधेगी और भाई कहेगा, “मैं तेरी रक्षा करूंगा।” एक धागा, एक वचन, एक कहानी जो सदियों से चली आ रही है।पर आज इस लाइन को सुनकर सवाल उठता है – क्या आज भी बहन को ही रक्षा की जरूरत है?
और क्या रक्षक सिर्फ भाई ही हो सकता है?कभी वो वक्त था जब कहा जाता था – लड़की अबला है। तब भाई का रक्षा-वचन एक ढाल था।पर आज वो जमाना खत्म हो गया है। आज लड़की अबला नहीं, सबला है। आज वो सिर्फ लक्ष्मी नहीं, घर की शक्ति भी है।आज कमाई से लेकर लड़ाई तक, हर मोर्चे पर लड़कियां कंधा मिलाकर खड़ी हैं।
घर में देखिए। सुबह पांच बजे उठकर जो बेटी पूरे घर को संभालती है, माँ-बाप की दवा, बच्चों का टिफिन और फिर खुद ऑफिस भागती है। वो घर भी चला रही है और कमाई में भी बराबर की हिस्सेदार है। कई घरों में आज बेटी ही परिवार का खर्च उठा रही है, भाई की फीस भर रही है, पिता का इलाज करा रही है। क्या वो रक्षक नहीं है?ऑफिस में देखिए।
वही लड़की जो कभी बाहर नहीं निकलती थी, आज कंपनियों में टीम लीड कर रही है। वो परिवार की आर्थिक रक्षा कर रही है।और बॉर्डर पर देखिए। वर्दी पहनकर, सियाचिन की बर्फ में, रेगिस्तान की धूप में हमारी बेटियां देश की रक्षा कर रही हैं, फाइटर जेट उड़ा रही हैं। जो देश की रक्षा कर सकती है, क्या वो अपनी रक्षा नहीं कर सकती?
गली में, बस में छेड़खानी का विरोध करने वाली, दफ्तर में गलत के खिलाफ आवाज उठाने वाली हर लड़की आज खुद अपनी रक्षक है।जब वो हर जगह परचम फहरा रही है, तो फिर आज भी रक्षाबंधन पर एक भाई ही क्यों रक्षक बनकर वचन दे रहा है? ये वचन अब अधूरा लगता है।बात तो तब बने, जब दोनों एक-दूसरे की मुसीबत में एक-दूसरे के लिए खड़े हों।
दोनों एक-दूसरे के रक्षक हों।रक्षा का मतलब अब सिर्फ दुश्मन से बचाना नहीं है। रक्षा का मतलब अब इससे कहीं बड़ा है।रक्षा का मतलब है – जब भाई नौकरी न मिलने से टूट जाए, तो बहन कहे – “तू चिंता मत कर, मैं हूँ।”रक्षा का मतलब है – जब बहन काम से थक जाए, तो भाई कहे – “तू आराम कर, आज घर मैं संभालता हूँ।”और जब बहन अपने भाई को गलत राह पर जाने से रोकती है, टोकती है कि “भाई ये गलत है”, तो वो भी तो रक्षा ही है।
वो उसके चरित्र की, उसके भविष्य की, उसके संस्कार की रक्षा कर रही है। रक्षा का मतलब है जरूरत पड़ने पर दोनों एक-दूसरे के कंधे पर सिर रख कर रो भी सकें।समाज ने लड़कों को सिखाया है कि रोना नहीं है। पर मजबूत रिश्ता वही है जहां भाई भी बहन के कंधे पर सिर रख कर कह सके कि “आज मैं हार गया।” और बहन उसे थाम सके।
यही तो सच्चा सहारा है।रिश्ता तभी बराबर बनता है जब दोनों एक-दूसरे की खुशी की वजह बनें। सिर्फ पैसे देना खुशी नहीं है। खुशी है जब भाई बहन की छोटी सी प्रमोशन पर दिल से ताली बजाए, उसकी उड़ान पर गर्व करे। और खुशी है जब बहन भी भाई की हार पर कहे – “कोई बात नहीं, अगली बार हो जाएगा। मैं हूं न मिलकर सब कर लेंगे”बहन हो या भाई, दोनों एक-दूसरे के रक्षक बनें, त्योहार तभी पूरा होगा। क्योंकि सिर्फ भाई ही रक्षक नहीं होता, आज लड़कियां भी रक्षक हैं।
बल्कि कई बार तो वो भाई से भी बड़ी रक्षक हैं।वो घर की नींव भी हैं और छत भी।और सबसे बड़ी बात, दोनों एक दूसरे के दुख में, तकलीफ में सहभागी बनें। अक्सर बहन का दुख सब जानते हैं, पर भाई का दुख कोई नहीं जानता। भाई चुपचाप पी जाता है। अब ये नहीं चलेगा।क्योंकि जो बहन कमाई से लेकर लड़ाई तक, घर से बॉर्डर तक तुम्हारे साथ खड़ी है, वो धागे में बंधी गुड़िया नहीं है।
वो तुम्हारी बराबर की योद्धा है।इस रक्षाबंधन पर जब बहन राखी बांधे तो भाई ये कहे – “आज से हम दोनों एक-दूसरे की रक्षा करेंगे। तेरी लड़ाई मेरी लड़ाई, मेरी लड़ाई तेरी लड़ाई। दोनों एक दूसरे की जीत में खुश होंगे और एक दूसरे की हार में एक दूसरे को थाम लेंगे।क्योंकि राखी का मतलब अब सुरक्षा देना नहीं, ये भरोसा देना है कि – “तू अकेली नहीं है, और मैं भी अकेला नहीं हूँ।
जरूरत पड़ी तो हम दोनों एक-दूसरे के कंधे पर सिर रख कर रो भी लेंगे और कंधे से कंधा मिलाकर दुनिया से लड़ भी लेंगे।”और जिस दिन रिश्ते में ये बराबरी आ गई, उस दिन समझना रक्षाबंधन का धागा सच में अटूट हो गया।तो इस रक्षाबंधन एक नहीं दो राखियां लाइये। एक बहन अपने भाई के हाथ पर बांधे और दूसरी भाई अपनी बहन के हाथ पर।और रक्षा का वचन एक तरफा नहीं दोनों तरफ से हो। और हां निराश मत होइए, जहां भाई नहीं वहां दो बहने, या दो दोस्त भी एक दूसरे की रक्षा का वचन ले सकते हैं।
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