विगत कुछ दिनों से कॉकरोच जनता पार्टी और उसके समर्थकों का मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर प्रदर्शन हो रहा था उसके खिलाफ अब दिल्ली पुलिस ने थोड़ा कड़ा रवैया इख्तियार किया है। इस पर यूट्यूबर ध्रुव राठी और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सह-संयोजक सौरव दास ने दिल्ली की मौजूदा स्थिति को ‘आपातकाल जैसी स्थिति’ और ‘खुला आपातकाल’ बताया है।
ध्रुव राठी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि पुलिस की कार्रवाई और संस्थागत दबाव के कारण उन्हें आपातकाल जैसी स्थिति का एहसास हुआ। नियोजित प्रदर्शन से पहले उन्हें कुछ समय के लिए हिरासत में भी लिया गया था। वहीं सौरव दास ने प्रदर्शनों के दौरान बने माहौल को ‘खुले आपातकाल’ जैसा बताया और इसकी तुलना वर्ष 1975 के आपातकाल से की।
लोकतंत्र की यह खूबसूरती है कि आप असहमत होने पर आवाज उठा सकते हैं। हम चाहें तो सरकार नीतियों पर सवाल भी उठा सकते हैं और चुनावी प्रक्रिया से संतुष्ट न होने पर सत्तारूढ़ सरकार से जवाब भी मांग सकते हैं। परंतु वर्तमान परिस्थिति को देखकर 1975 की आपातकाल से तुलना करने से पहले दोनों के बीच का अंतर समझना भी जरूरी है।
25 जून 1975 को जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश में राष्ट्रीय आपातकाल लागू किया गया था तो स्थिति काफी गंभीर थी। यह भारतीय लोकतंत्र का वो काला दौर था जब नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक रूप से प्रतिबंध लगाए गए। प्रेस पर सेंसरशिप लागू किया गया जो कहीं से भी यथोचित नहीं था। आपातकाल के वक़्त जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई जैसे जाने कितने दिग्गज नेताओं को गिरफ्तार किया गया। कई लोगों को मिस जैसे कानूनों के तहत लबे समय तक हिरासत में रखा गया।
इसके विपरीत वर्तमान राजनीतिक राजनीतिक परिस्थितियां इससे काफी अलग है। आज अगर प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जाता है तो ये महज एक खानापूर्ति मात्र है। उग्र भीड़ के प्रति पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई उसे आपातकाल से तुलना करने के लिए उत्साहित नहीं कर सकती है। इन गतिविधियों को कहीं से भी 1975 के आपातकाल से तुलना करना तर्कसंगत नहीं लगता। किसी घटना की गंभीरता का आकलन उसके संदर्भ, कानूनी आधार, कार्रवाई की व्यापकता और नागरिक अधिकारों पर उसके वास्तविक प्रभाव से होना चाहिए न कि आंशिक रूप से स्थिति में दिख रही समानताओं से।
आपातकाल के दौरान दिल्ली सहित कई इलाकों से झुग्गी-बस्तियों को हटाने के अभियान चलाए गए। साथ ही परिवार नियोजन अभियान के तहत न जाने कितनी संख्या में लोगों को नसबंदी करने के लिए बाध्य किया गया। आपातकाल के दौरान संविधान में कुछ ऐसे बदलाव किये गए जिनसे सत्ता का केन्द्रीकरण बढ़ा और संस्थागत संतुलन को लेकर लोगों में भारी असंतोष उत्पन्न हुआ।
हालाँकि, इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वर्तमान में होने वाली हर पुलिस कार्रवाई या प्रशासनिक निर्णय को उचित मान लिया जाए। शांतिपूर्ण विरोध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रक्षा करना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी है। यदि इन अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो उसकी आलोचना, जाँच और जवाबदेही की माँग पूरी तरह उचित है।लोकतंत्र की खूबसूरती केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि असहमति को सम्मान देने, संस्थाओं को स्वतंत्र बनाए रखने और सत्ता को जवाबदेह बनाने में है।
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