चंडीगढ़ सेक्टर-30 के संत निरंकारी सत्संग भवन में साप्ताहिक सत्संग, हजारों श्रद्धालुओं ने सुने आध्यात्मिक विचार
चंडीगढ़। सेक्टर-30 के संत निरंकारी सत्संग भवन में आयोजित साप्ताहिक सत्संग में अमृतसर से पहुंचे प्रचारक परमजीत सिंह मोमन ने दास भावना, निष्काम सेवा, सुमिरन और सत्संग के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सच्चा गुरसिख वही है, जो हर पल और हर श्वास सतगुरु का दास बनकर रहता है तथा बिना किसी किंतु-परंतु के सतगुरु के बताए मार्ग पर चलता है।
गुरसिख चाहे कितना भी सयाना, विद्वान या धन-दौलत वाला क्यों न हो, उसे अपनी चतुराई और धन का अहंकार नहीं करना चाहिए। गुरु के दर पर आकर अपने ‘मैं’ और अहंकार को समाप्त करना ही सच्ची दास भावना है। जो गुरसिख सतगुरु से प्राप्त संदेश को सहर्ष स्वीकार करता है और उसकी रजा़ में अपनी भलाई समझता है, वह फल की इच्छा किए बिना सेवा, सुमिरन और सत्संग करता है। ऐसे गुरसिख का सतगुरु स्वयं मान बढ़ाता है और उसके पूरे वंश का नाम रोशन करता है।
मन की शुद्धता और दास भावना का संदेश
चांदी के शुद्धिकरण का उदाहरण देते हुए बताया कि जब तक चांदी में उबाल रहता है, तब तक वह शुद्ध नहीं होती। जब उसमें अपना प्रतिबिंब दिखाई देने लगे, तभी उसके शुद्ध होने का संकेत मिलता है। इसी प्रकार जब तक मन दूसरों की कमियां गिनता रहता है, तब तक मन की शुद्धता अधूरी है। जब हर गुरसिख में सतगुरु का रूप दिखाई देने लगे, तभी दास भावना की शुरुआत होती है।
सच्चा ज्ञान वह नहीं है, जिसे मनुष्य बोझ की तरह अपने कंधों पर लेकर चले, बल्कि वास्तविक ज्ञान वह है जो जीवन को सहज, सरल और सुखमय बना दे।
अहंकार की ‘टहनी’ काटने का संदेश
सत्संग के दौरान उन्होंने एक बादशाह और दो बाजों की कथा सुनाते हुए कहा कि जो बाज बार-बार एक ही टहनी पर आकर बैठ जाता था, वह उस समय ऊंची उड़ान भर सका, जब वह टहनी काट दी गई। इसी प्रकार मनुष्य के भीतर का ‘मैं करूंगा तभी ठीक होगा’ वाला भाव अहंकार की टहनी है। इसके कटने पर ही मनुष्य आध्यात्मिक ऊंचाइयों को छू सकता है।
उन्होंने कहा कि हमें कर्ता बनकर नहीं, बल्कि दास बनकर कार्य करना चाहिए। फैसला करने का अधिकार हमारा नहीं, बल्कि हमें केवल अपना कर्म करना है।
प्रभु पर पूर्ण विश्वास रखने की सीख
द्रौपदी के उदाहरण के माध्यम से बताया कि जब तक द्रौपदी को अपने पतियों और परिवार के अन्य सदस्यों के बल पर भरोसा रहा, तब तक बात नहीं बनी। जब उसने हाथ जोड़कर प्रभु का ध्यान किया, तब उसकी लाज बची।
जिस प्रकार मां पालने में सोए बच्चे के रोने की आवाज सुनकर अपने सभी काम छोड़कर उसे गोद में उठा लेती है, उसी प्रकार जो भक्त स्वयं को अधिक सयाना न मानकर पूर्ण रूप से निरंकार पर निर्भर हो जाता है, प्रभु स्वयं उसे अपना लेता है। उन्होंने कहा कि परमपिता परमात्मा ही सभी का आधार है और उसके बिना कुछ भी टिक नहीं सकता।
‘सबमें एक परमात्मा’ को देखने पर सच्ची भक्ति
भाव और भक्ति को एक-दूसरे से जुड़ा बताते हुए बताया कि सत्संग भवन में प्रवेश करते समय मन की अवस्था एक याचक जैसी होनी चाहिए। सतगुरु माता सुदीक्षा महाराज के वचनों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब अपने आगे और पीछे बैठे हर महात्मा में वही प्रभु नजर आने लगे, तभी सच्ची भक्ति की शुरुआत होती है।
उन्होंने कहा कि आंख और कान मन के प्रवेश द्वार हैं। इसलिए इन्हें गुरु की दृष्टि से दुरुस्त करना चाहिए, ताकि उनमें सभी के भीतर एक ही परमात्मा दिखाई और सुनाई दे तथा मनुष्य निंदा और चुगली से दूर रहे। उन्होंने कहा कि जीवन का वास्तविक रस और आनंद दास भावना और भक्ति में ही है।
सत्संग के अंत में उन्होंने सतगुरु से सभी को अपनी शरण और चरणों से जोड़े रखने की अरदास की।
इससे पूर्व स्थानीय संयोजक नवनीत पाठक ने अमृतसर से आए प्रचारक परमजीत सिंह मोमन का साधसंगत की ओर से स्वागत एवं धन्यवाद किया।
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