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 शौचालय के पास फर्श पर बैठा वो फौजी, और एसी में चादर ओढ़े सोया हुआ हमारा ज़मीर

कल मेरी मम्मी असम से दिल्ली आ रही थीं। 35 घंटे का सफर। स्लीपर कोच में देखा, शौचालय के पास फर्श पर एक भाई सिकुड़कर बैठा है। लाल आंखें, पीठ पर भारी बैग और देखने से ही समझ आ रहा था कि फौजी है।

7 दिन की इमरजेंसी लीव मिली थी। घर में माँ बीमार थीं। न रिजर्वेशन, न वक्त। टिकट था पर कन्फर्म नहीं था । टीटी ने आकर कहा आपकी सीट कन्फर्म नहीं है भाई आप इस डब्बे में सफर नहीं कर सकते। इस तरह फर्श पर तो बिल्कुल नहीं। रिक्वेस्ट करने पर टीटी ने कहा अगर कोई आपका सामान सीट के पास एडजस्ट कर ले तो ठीक वरना मुश्किल है। उसने कई लोगों से रिक्वेस्ट की पर किसी ने भी एडजस्ट नहीं किया। मम्मी ने पूछा बेटा क्या टिकट देर से किया था?

 बोला  “आंटी, अचानक छुट्टी सैंक्शन हुई बुकिंग का समय नहीं था, मां बीमार है इसलिए जा रहा हूं। 35 घंटे आने में लगेंगे, 35 घंटे जाने में। बीच के 2-3 दिन माँ के पास बैठ लूंगा, बस इसी आश में निकला हूँ।”

मम्मी से जब देश के सपूत को ऐसे फर्श पर बैठे देखा नहीं गया तो उन्होंने अपनी साइड लोअर सीट पर उसे बिठाया, उसका भारी बैग भी अपने पास किसी तरह एडजस्ट करवा लिया। खाने को जो भी अपने लिए था वो सब खोलकर उसके साथ साझा किया।ये सब देखकर फौजी भावुक हो गया। घर पर कॉल करके बोला “माँ, मुझे रास्ते में माँ जैसी ही एक आंटी मिल गई हैं। अब फिक्र मत कर सफ़र आराम से कटेगा वो अपने बेटे की तरह मुझे मदद कर रही हैं।”

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सफर में ढेर सारी बातें हुईं। उसने अपने गांव, अपनी ड्यूटी, अपने सपनों की बात बताई। मम्मी ने अपने घर-परिवार की। उतरने से पहले दोनों ने फोन नंबर एक्सचेंज किए। उसने कहा- मां जी इतने सालों में आज तक आप जैसा कोई नहीं मिला।लोग कभी जरा सा एडजस्ट नहीं करते और आपने तो इतना अपना पन दिया। फिर वो हमेशा के लिए माँ-बेटे की तरह एक रिश्ता जोड़कर, फोन पर जुड़े रहने का वादा देकर अपनी-अपनी मंजिल की ओर चल दिए।

उतरते वक्त फौजी बोला “आंटी, ये बात सबको बताना। ताकि कल किसी और फौजी को फर्श पर शौचालय के पास बैठकर यात्रा न करनी पड़े।” हमे आदत है मुश्किलों से परेशान न होने की पर अपने ही देश के लोग जब रुखा बर्ताव करते हैं तो तकलीफ़ गोली से भी ज्यादा होती है।

माँ ने मुझसे कहा — इस कहानी को अखबार में लिखो  ताकि हर किसी को समझ आए कि फौजी का सम्मान करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है ये एहसान नहीं उनका कर्ज़ है। हम पर जिसे तिल भर चुकाने का ये मौका है।

तो आज मैं अपनी कलम का असली फर्ज़ निभा रही हूँ। माँ का आदेश और मेरी जिम्मेदारी मानकर ये कहानी लिख रही हूँ और भारत के हर नागरिक तक पहुंचाने की कोशिश कर रही हूँ।

ट्रेन की सीटी बजती है। प्लेटफॉर्म पर भीड़ है। जनरल डिब्बे के दरवाज़े पर धक्का-मुक्की है और उसी भीड़ में, फौजी वर्दी पहने, पीठ पर भारी बैग लादे, एक जवान चुपचाप शौचालय के पास वाली फर्श पर बैठ जाता है।

उसकी सीट कन्फर्म नहीं है। छुट्टी अचानक मिली है। यूनिट से फोन आया  “घर में माँ बीमार है, 7 दिन की लीव मिलेगी, अभी निकलो”। न रिजर्वेशन का वक्त था, न तत्काल का भरोसा। बस ट्रेन पकड़नी थी क्योंकि सरहद पर खड़े फौजी के लिए माँ की तबीयत भी “इमरजेंसी ड्यूटी” है।

खाना? डिब्बा पैक नहीं कर पाया। पानी की बोतल आधी बची है। और सफर? 18 घंटे, 26 घंटे, कभी 40 घंटे। शौचालय के बाहर, दरवाज़े के पास, दो सीटों के बीच की जगह में सिकुड़कर।

ये कोई कहानी नहीं है। ये हर हफ्ते, हर रूट पर दिखने वाला सच है।

1. हमारा आराम, उसकी मजबूरी।

हम उसी ट्रेन में होते हैं। AC-2 में कंबल ओढ़े, साइड लोअर पर पैर पसारे। मोबाइल में रील देख रहे होते हैं। तभी बगल से गुजरता है वो जवान।हम ऐसे नाक सिकोड़ते हैं जैसे बदबू आ रही हो। “यहाँ क्यों बैठा है भाई?” कहकर मुंह बना लेते हैं।

कोई अपना बैग थोड़ा खिसकाने को तैयार नहीं। “जगह नहीं है”। “RAC वाला आएगा”। “ऊपर वाला अभी सो रहा है”। बहाने हज़ार हैं।

ज़रा सोचिए जो आदमी सियाचिन में -40 डिग्री में 18 महीने काट देता है, जो जंगल में रात-रात भर घात लगाकर बैठता है, जो गोली की आवाज़ सुनकर भागता नहीं, आगे बढ़ता है, क्या वो 2 फीट जगह का मोहताज है? नहीं।

वो मोहताज है हमारी संवेदना का। हमारे “थैंक्यू फॉर योर सर्विस” का नहीं, हमारे दो मिनट के एक्शन का।

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2. छुट्टी नहीं, एहसान लगती है।

फौज की छुट्टी आम आदमी की छुट्टी जैसी नहीं होती। हमें वीकेंड पता होता है। हम 3 महीने पहले फ्लाइट बुक करते हैं। फौजी को छुट्टी मिलती है “अगर यूनिट अफसर माने, अगर हालात ठीक हों, अगर कोई रिलीव करने आ जाए”।

कई बार जवान की शादी की तारीख 4 बार टलती है। पिता के अंतिम दर्शन नहीं कर पाता। बच्चा पैदा होता है तो वो वीडियो कॉल पर उसका चेहरा देखता है।

और जब बमुश्किल 10 दिन की छुट्टी मिलती है, तो उसका आधा वक्त ट्रेन में, बस में, शौचालय के पास बैठकर बीत जाता है। क्योंकि “सीट कन्फर्म नहीं थी”।

क्या हम देशभक्ति सिर्फ 15 अगस्त और 26 जनवरी को DJ पर गाना बजाकर दिखाएंगे? क्या वर्दी वाले को देखकर सीना तानना सिर्फ परेड में अच्छा लगता है, प्लेटफॉर्म पर नहीं?

3. वो हमसे सीट नहीं मांग रहा, हक भी नहीं, बस इंसानियत मांग रहा है

वो आपसे आपकी रिजर्व सीट नहीं छीनने आया। वो ये भी नहीं कहता “मुझे लेटने दो”। वो बस चाहता है कि उसका बैग आपकी सीट के नीचे आ जाए तो आप टोकें नहीं। वो चाहता है कि अगर आप वॉशरूम जा रहे हैं तो 2 मिनट उसे पैर समेटने का वक्त दें, उस पर नाराज़ न हों।

वो चाहता है कि अगर आपके पास एक्स्ट्रा चादर है, तो पूछ लें  “भाई ठंड लग रही है क्या?”।

यकीन मानिए, फौजी सबसे कम मांगता है। उसने मांगना सीखा ही नहीं। उसने देना सीखा है। अपनी नींद देना, अपना खून देना, अपना कल देना, अपने परिवार के साथ बिताने वाला एक एक पल देना। और अपनी जान तक दे देना, ताकि हमारा आज और कल महफूज़ रहे।

तो क्या हम इतने गए-गुज़रे हो गए कि 40 घंटे के सफर में कुछ देर भी 2 फीट जगह नहीं दे सकते?

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4. देशभक्ति नारों में नहीं, नजरिए में होती है।

हम सोशल मीडिया पर लिखते हैं — ।  Love Indian Army प्रोफाइल पर तिरंगा लगाते हैं। रील पर “संदेश आते हैं” बजाते हैं। पर अगली सुबह ट्रेन में जब वही तिरंगा थामने वाला इंसान हमारे सामने फर्श पर बैठा होता है, तो हम नज़र चुरा लेते हैं।

देशभक्ति का मतलब सिर्फ़ बॉर्डर पर जाना ही नहीं होता। देशभक्ति का मतलब बॉर्डर वाले का ख्याल रखना भी हो सकता है।

अगर आप 1AC में हैं तो अटेंडेंट से कहकर एक कप चाय भिजवा दीजिए। अगर 3AC में हैं, तो TTE से रिक्वेस्ट कीजिए कि कोई सीट एडजस्ट हो जाए। अगर स्लीपर में हैं, तो कम से कम 2 घंटे अपनी सीट शेयर कर लीजिए — आप ऊपर चले जाइए, उसे नीचे लेटने दीजिए।

ये अहसान नहीं है। ये उधार चुकाना है। क्योंकि वो रोज़ आपकी नींद के लिए अपनी नींद कुर्बान करता है। वो आपकी खुशी के लिए अपनी खुशियां घर छोड़कर आता है। आप अपने परिवार के साथ चैन की साँस ले सकें इसलिए वो अपने परिवार से दूर रहकर अपनी साँसें देश के नाम कर देता है।

5. सिस्टम से शिकायत बाद में, पहले खुद से सवाल।

हाँ, रेलवे को चाहिए कि हर ट्रेन में फौजियों के लिए 2-4 सीट का “डिफेंस कोटा” इमरजेंसी के लिए रिजर्व रहे। हाँ, स्टेशनों पर “सोल्जर लाउंज” बेहतर होने चाहिए। हाँ, छुट्टी पर जाने वाले जवानों के लिए अलग हेल्प डेस्क हो।

ये सब सरकार करे। पर सरकार के ही भरोसे क्यों बैठें?

जब तक सिस्टम बदलेगा, तब तक क्या हम इंसानियत छोड़ दें?

एक जवान ने कहा था  “साहब, हमें गोली से डर नहीं लगता। तकलीफ होती है जब देशवासी हमें परायों जैसा समझते हैं”।

ये लाइन चुभनी चाहिए। हर उस इंसान को जो एसी में बैठकर देशभक्ति की डींग मारता है।

6. आज से एक वादा  “वर्दी देखकर जगह देंगे”।

अगली बार ट्रेन में, बस में, कहीं भी कोई फौजी भाई शौचालय के पास बैठा दिखे, तो 3 काम कीजिए:

1. उठिए

 अगर मुमकिन हो तो अपनी सीट ऑफर कीजिए। 2-3 घंटे ही सही। आपकी कमर नहीं टूटेगी, उसका भरोसा जुड़ जाएगा।

2.  पूछिए

“भाई खाना खाया? पानी है? घर कितनी दूर है?”। यकीन मानिए, इस एक सवाल से उसकी 40 घंटे की थकान आधी हो जाएगी।

3. बोलिए

बाकी पैसेंजर्स को भी कहिए — “अरे एडजस्ट कर लो दोस्त, फौजी है”। आपकी आवाज़ से 4 लोग और हिम्मत करेंगे।

क्योंकि सम्मान ताली बजाने से नहीं, साथ बैठने से दिखता है।

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आखिरी बात, फर्श से नज़रिया बदलता है।

शौचालय के पास बैठकर सफर करने वाला फौजी सिर्फ सफर नहीं कर रहा। वो हमें आईना दिखा रहा है। कि जिस आज़ादी में हम पैर पसार कर सोते हैं, वो किसी के सिकुड़ कर बैठने से मिलती है।

जिस तिरंगे को हम स्टेटस पर लगाते हैं, उसे वो कफन की तरह लपेटकर घर आने को हमेशा तैयार रहता है।

तो अगली बार जब आप ट्रेन में चढ़ें और कोई वर्दी वाला फर्श पर दिखे, तो उसे “समस्या” मत समझिए। उसे “समाधान” समझिए, अपने ज़मीर का।

उठिए। जगह दीजिए। सिर झुकाकर नहीं, सिर उठाकर कहिए  “जय हिंद, भाई। आओ, बैठो। ये देश जितना मेरा है, उससे कहीं ज़्यादा तुम्हारा है”।

क्योंकि अगर वो नहीं होता, तो हम ट्रेन में नहीं, बंकर में बैठे होते।

और हाँ , अगर आज आपने एक फौजी को सीट दी, तो समझ लीजिए आपने भारत माता को आराम दिया।

माँ का हुक्म, बेटी की कलम और फौजी का दर्द — इन तीनों को एक साथ जोड़कर ये कहानी भारत के हर नागरिक तक पहुंच रही है।

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लेखिका

आर. जे. रेखा क्रिस्टल वॉयस

आकाशवाणी FM Gold 100.1

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