
सहायक प्राध्यापक
( खेल विश्वविद्यालय हरियाणा, राई, सोनीपत)
आज का समय Media का समय है। सुबह आंख खुलते ही इंसान मोबाइल, टीवी, सोशल मीडिया, Newspaper और इंटरनेट के माध्यम से मीडिया से जुड़ जाता है। राजनीति से लेकर खेल, शिक्षा, मनोरंजन, संस्कृति और सामाजिक जागरूकता तक हर क्षेत्र में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है। हर व्यक्ति मीडिया को जानता है, समझता है और उससे प्रभावित होता है, लेकिन जब बात शिक्षा के क्षेत्र में पत्रकारिता एवं जनसंचार की आती है, तब यह विषय कहीं न कहीं गुमनाम दिखाई देता है। यही कारण है कि यह पंक्ति बिल्कुल सही प्रतीत होती है—“जो है नाम वाला वही गुमनाम है।”
देश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में लगभग हर विषय के लिए सहायक प्रोफेसर, प्रोफेसर और शिक्षकों की नियमित रिक्तियां निकलती रहती हैं, लेकिन पत्रकारिता एवं जनसंचार विषय के लिए अवसर बहुत कम दिखाई देते हैं।
यह एक गंभीर प्रश्न है कि जिस मीडिया के बिना आधुनिक समाज की कल्पना अधूरी है, उसी मीडिया शिक्षा को शिक्षा व्यवस्था में उचित स्थान क्यों नहीं मिल पा रहा। क्या मीडिया को केवल कैमरा, एंकरिंग और ग्लैमर तक सीमित समझ लिया गया है?
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जबकि वास्तविकता यह है कि मीडिया अध्ययन केवल समाचार तक सीमित नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति, संचार, शोध, विज्ञापन, जनसंपर्क, डिजिटल मीडिया और लोकतंत्र की समझ से जुड़ा हुआ व्यापक विषय है।
इस स्थिति के पीछे कई कारण दिखाई देते हैं। सबसे पहला कारण शिक्षा व्यवस्था की वह सोच है जिसमें लंबे समय तक पत्रकारिता को केवल व्यावसायिक कोर्स मानकर देखा गया, न कि एक गंभीर अकादमिक विषय के रूप में। दूसरा कारण यह भी है कि मीडिया शिक्षा से जुड़े लोगों की अकादमिक और नीतिगत भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही।
तीसरा कारण समाज की मानसिकता है, जहां आज भी डॉक्टर, इंजीनियर और प्रशासनिक सेवाओं को स्थायी पहचान माना जाता है, जबकि मीडिया को अनिश्चित क्षेत्र समझा जाता है। वहीं छात्रों में भी मीडिया शिक्षा को लेकर शोध और शिक्षण के प्रति जागरूकता सीमित दिखाई देती है।
आज जब समाज फेक न्यूज़, अफवाहों और सूचना के दुरुपयोग जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब मीडिया शिक्षा की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। मीडिया केवल खबरें दिखाने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को सोचने, समझने और जागरूक बनाने की शक्ति है।
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ऐसे में आवश्यक है कि पत्रकारिता एवं जनसंचार को शिक्षा व्यवस्था में समान महत्व दिया जाए, विश्वविद्यालयों में स्थायी विभाग स्थापित हों, शिक्षकों की नियमित नियुक्तियां हो और मीडिया रिसर्च को बढ़ावा मिले। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक यह सवाल बना रहेगा कि जिस विषय का नाम हर व्यक्ति की जुबान पर है, वही शिक्षा के क्षेत्र में गुमनाम क्यों है।

