महेन्द्र तिवारी
भारत और नेपाल के मध्य सदियों पुराने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध रहे हैं जो विश्व पटल पर एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। दोनों देशों के बीच लगभग 1751 किलोमीटर की लंबी खुली सीमा है। दोनों राष्ट्रों के नागरिक बिना किसी विशेष अनुमति पत्र के एक दूसरे के देश में अबाध रूप से आ जा सकते हैं, कार्य कर सकते हैं और व्यापार कर सकते हैं। पशुपतिनाथ और काशी विश्वनाथ जैसे पवित्र स्थल दोनों देशों की आस्था को एक समान सूत्र में बांधते हैं। इसके अतिरिक्त दोनों देशों के बीच अत्यंत प्रगाढ़ पारिवारिक और सामाजिक संबंध हैं। आर्थिक रूप से भी नेपाल अपने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए मुख्य रूप से भारतीय बंदरगाहों पर निर्भर करता है। भारत नेपाल को पेट्रोलियम, खाद्यान्न, दवाइयाँ और बिजली जैसी आवश्यक वस्तुएँ निरंतर प्रदान करता है। वर्ष 1950 की शांति और मित्रता संधि दोनों देशों के संबंधों की आधारशिला है। इस संधि ने नेपाल के नागरिकों को भारत में रोजगार और निवास करने के वे सभी अधिकार दिए हैं जो किसी भारतीय नागरिक को प्राप्त हैं। भारतीय सेना में गोरखा सैनिक इसका एक गौरवशाली प्रमाण हैं जो दशकों से भारत की सुरक्षा के लिए अपना सर्वोच्च योगदान देते आए हैं। इतनी गहरी मित्रता और निर्भरता के बावजूद दोनों देशों के बीच सीमा से जुड़े कुछ संवेदनशील विषय समय समय पर कूटनीतिक तनाव का कारण बनते रहे हैं।
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हाल ही में काठमांडू के महापौर बालेन्द्र शाह के एक वक्तव्य ने इस पुराने सीमा विवाद को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। नेपाल की संसद और सार्वजनिक मंचों पर इस विषय ने एक नई बहस को जन्म दिया है। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि केवल भारत ने ही नेपाल की जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया है बल्कि नेपाल के लोगों ने भी कुछ स्थानों पर भारतीय भूमि का उपयोग किया है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि दोनों देशों को कूटनीतिक वार्ताओं, इतिहासकारों और सर्वेक्षण विशेषज्ञों की सहायता से इस विवाद का स्थायी समाधान खोजना चाहिए। नेपाल की राजनीति में जहाँ अक्सर राजनीतिक लाभ लेने के लिए भड़काऊ भावनाएं फैलाई जाती हैं, वहाँ एक लोकप्रिय युवा नेता द्वारा इस प्रकार का संतुलित और दोनों पक्षों की कमियों को स्वीकार करने वाला वक्तव्य आना एक अप्रत्याशित घटना थी। उनके इस बयान का नेपाल के भीतर कड़ा विरोध भी हुआ जिसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय को यह स्पष्टीकरण देना पड़ा कि महापौर का आशय सीमा पार खेती और स्थानीय निवासियों द्वारा भूमि के उपयोग से था न कि किसी राजनीतिक कब्जे से।
भारत और नेपाल के बीच मुख्य सीमा विवाद कालापानी, लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और सुस्ता क्षेत्रों को लेकर है। कालापानी क्षेत्र भारत के उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले के पास स्थित है और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र भारत, नेपाल और तिब्बत के त्रिकोणीय भूभाग के पास स्थित है। वर्ष 1962 के युद्ध के बाद से भारत ने यहाँ अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की है। लिपुलेख दर्रा कैलाश मानसरोवर यात्रा के मुख्य मार्ग के रूप में भी जाना जाता है। इस विवाद की ऐतिहासिक जड़ें वर्ष 1816 की सुगौली संधि में निहित हैं जो ब्रिटिश शासकों और नेपाल के राजा के बीच हुई थी। इस संधि के अनुसार महाकाली नदी को दोनों देशों के बीच की पश्चिमी सीमा माना गया था। सारा विवाद इस बात पर केंद्रित है कि महाकाली नदी का वास्तविक उद्गम स्थल कौन सा है। नेपाल का दावा है कि नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है जिसके आधार पर कालापानी और लिपुलेख उसके भूभाग का हिस्सा बन जाते हैं। दूसरी ओर भारत का स्पष्ट मानना है कि नदी का उद्गम कालापानी के पास से होता है और इसलिए यह पूरा क्षेत्र भारत का अभिन्न अंग है।
वर्ष 2020 में यह कूटनीतिक तनाव अपने चरम पर पहुँच गया था जब भारत ने धारचूला से लिपुलेख तक एक नई सड़क का निर्माण किया ताकि तीर्थयात्रियों को सुविधा हो सके। इसके प्रतिक्रिया स्वरूप नेपाल सरकार ने अपना नया राजनीतिक मानचित्र जारी कर दिया जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दर्शाया गया। इस कदम ने दोनों देशों के बीच राजनीतिक संवाद को लगभग रोक दिया था। नेपाल के कुछ नेताओं ने इस विवाद में ब्रिटेन और चीन के साथ संवाद करने की बात भी कही थी। भारत हमेशा से यह दृढ़तापूर्वक मानता रहा है कि भारत और नेपाल के बीच का सीमा विवाद पूरी तरह से एक द्विपक्षीय विषय है और इसमें किसी भी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता।
नेपाल के पूर्व कूटनीतिज्ञों और सीमा विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि भारत और नेपाल के बीच लगभग 97 प्रतिशत सीमा का निर्धारण सफलतापूर्वक हो चुका है और केवल कुछ ही स्थानों पर सीमा स्तंभों की स्थिति को लेकर भ्रम है। सुस्ता क्षेत्र का विवाद गंडक नदी के मार्ग बदलने के कारण उत्पन्न हुआ है। नदियों के प्राकृतिक बहाव में परिवर्तन अक्सर सीमावर्ती क्षेत्रों में नई चुनौतियाँ पैदा करता है जिनका समाधान तकनीकी और सर्वेक्षण समितियों द्वारा किया जा सकता है। दोनों देशों के बीच संयुक्त सीमा कार्यसमूह पहले से ही इन विषयों पर कार्य कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो शेष 3 प्रतिशत विवादित सीमा का समाधान भी शांतिपूर्ण ढंग से किया जा सकता है।
वर्तमान भूराजनीतिक परिदृश्य में चीन का बढ़ता प्रभाव भी इस विवाद को जटिल बनाता है। चीन नेपाल में भारी मात्रा में आर्थिक निवेश कर रहा है और सड़क, रेल तथा अन्य आधारभूत ढांचों का निर्माण कर रहा है। भारत की सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि नेपाल के साथ उसके संबंध मधुर बने रहें ताकि कोई अन्य देश इस कूटनीतिक दूरी का लाभ न उठा सके। नेपाल भी एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत और चीन के बीच संतुलन बनाकर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का संचालन करना चाहता है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत और नेपाल के संबंध केवल नक्शों और सीमा रेखाओं के मोहताज नहीं हैं। दोनों देशों के नागरिकों के बीच जो गहरा विश्वास और आत्मीयता है वह किसी भी कूटनीतिक विवाद से कहीं अधिक शक्तिशाली है। भड़काऊ बयानों के स्थान पर ऐतिहासिक दस्तावेजों, तथ्यों और व्यावहारिक कूटनीति के आधार पर समाधान खोजना ही एकमात्र विकल्प है। यदि दोनों देश परस्पर सम्मान और संवाद की प्रक्रिया को निरंतर बनाए रखते हैं तो सीमा विवाद को सुलझाना कोई असंभव कार्य नहीं है। भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और समृद्ध दक्षिण एशिया के निर्माण हेतु भारत और नेपाल की अटूट मित्रता अत्यंत आवश्यक है।
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