14 सितंबर आते ही हमारे देश में हिंदी अचानक वीआईपी बन जाती है। सरकारी दफ्तरों में धूल खाती हिंदी फाइलों को सम्मानपूर्वक बाहर निकाला जाता है। उनपर हिंदी का आवरण चढ़ाया जाता है। मंच पर फूल सजते हैं, प्रतियोगिताओं की घोषणा होती है और बड़े-बड़े बैनरों पर लिखा जाता है, “हिंदी अपनाइए, राष्ट्र को आगे बढ़ाइए।” इस वर्ष भी राजभाषा विभाग द्वारा हिंदी दिवस और अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा।
समारोह शुरू होने से पहले ही चाय आ जाती है। उसके बाद गरमागरम समोसे भी। लोग खूब आनंद लेते हैं और प्रसंशा में कहते हैं, “वाह! मजा आ गया, समोसा बहुत टेस्टी था।” चाय खत्म होते ही वही व्यक्ति आयोजक से मुस्कुराकर बोलता है, “थैंक यू सर, इट वाज़ वंडरफुल अरेंजमेंट।”
हमारा समाज बड़ा उदार है। पेट में हिंदी का समोसा जाता है, गले से हिंदी की चाय उतरती है, लेकिन जुबान से अंग्रेजी का “थैंक यू” ही निकलता है। जैसे समोसे का पाचन तंत्र और भाषा का संबंध किसी दूसरे ग्रह से हो। किसी ने आज तक यह नहीं कहा कि समोसा खाने के बाद “धन्यवाद” बोलने से अपच हो जाती है, फिर भी “थैंक यू” हमारे संस्कारों का आधुनिक टीका बन चुका है।
आजकल हमारी उम्मीदें भी बदल गई हैं। पहले दादी इंतजार करती थीं कि नवजात बच्चा कब “माँ” बोलेगा। और माता पिता उत्सुक रहते हैं कि कब वह “हैलो” बोले। अगर बच्चा विद्यालय से लौटते समय घर पर किसी को “धन्यवाद” कह दे तो परिवार चिंतित हो जाता है कि कहीं इसका दाखिला गलत विद्यालय में तो नहीं हो गया।
हमारे दफ्तरों में भाषा का दृश्य और भी मनोरंजक है। सुबह प्रवेश करते ही चपरासी कहता है, “नमस्ते साहब।” साहब उत्तर देते हैं, “गुड मॉर्निंग।” दस मिनट बाद वही साहब हिंदी दिवस पर भाषण देते हैं, “हमें कार्यालयीन कार्य अधिकाधिक हिंदी में करना चाहिए।” भाषण समाप्त होते ही सचिव से कहते हैं, “प्लीज मेल मी द ड्राफ्ट।” भाषा शायद पहली चीज है जो भाषण में बदल जाती है।
बाजार का हाल देखिये। मिठाई की दुकान पर बोर्ड लगा है, लिखा है, “शुद्ध देसी घी की जलेबी।” उसके नीचे अंग्रेजी में इटालिक्स में लिखा है, “फील द ट्रेडिशन।” मानो जलेबी तब तक पारंपरिक नहीं मानी जाएगी जब तक उसके साथ अंग्रेजी का प्रमाणपत्र न लगा हो।
रेस्तरां में जाइए। वेटर पूछेगा, “सर, टी ऑर कॉफी?” आप कहिए, “भाई, चाय दे दो।” वह मुस्कुराकर लिखेगा, Tea। समोसा मांगिए, बिल में छपेगा Crispy Samosa। लगता है जैसे समोसा अंग्रेजी पहनकर ही रसोई से बाहर निकलता है।
सबसे मजेदार दृश्य हिंदी दिवस की प्रतियोगिताओं में दिखाई देता है। विषय होता है, “हिंदी का महत्व।” प्रतिभागी मंच पर आता है और शुरू करता है, “रेस्पेक्टेड चीफ गेस्ट, ऑनरेबल जजेज, एंड ऑल माय डियर फ्रेंड्स…” फिर अचानक याद आता है कि प्रतियोगिता हिंदी की है, तो तुरंत जोड़ देता है, “मैं आप सभी का हार्दिक स्वागत करता हूँ।” यह वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति धोती पहनकर ऊपर टाई लगा ले।
विद्यालयों में भी हिंदी का उत्सव एक दिन का मेहमान है। हिंदी सप्ताह में बच्चे कविता सुनाते हैं, निबंध लिखते हैं, सुलेख प्रतियोगिता जीतते हैं। अगले ही दिन वही बच्चा अगर गलती से हिंदी में आवेदन लिख दे तो शिक्षक कहते हैं, “इसे अंग्रेजी में लिखो, यही आगे काम आएगी।” बच्चा समझ नहीं पाता कि आखिर सम्मान किस भाषा का करना है ?
हमने भाषाओं के बीच भी एक अदृश्य जाति व्यवस्था बना दी है। हिंदी दिल की भाषा है और अंग्रेजी बिल की भाषा। हिंदी में प्यार जताइए, अंग्रेजी में भुगतान कीजिए। हिंदी में कविता लिखिए, अंग्रेजी में सीवी बनाइए। हिंदी में माँ पुकारिए, अंग्रेजी में इंटरव्यू दीजिए।
दोष अंग्रेजी का बिल्कुल नहीं है। अंग्रेजी भी एक समृद्ध भाषा है और ज्ञान का बड़ा माध्यम है। व्यंग्य उस मानसिकता पर है जिसमें अपनी भाषा बोलते समय हमें संकोच होने लगता है। हम हिंदी बोलते हुए बार बार यह देख लेते हैं कि सामने वाला हमें कम पढ़ा लिखा तो नहीं समझ लेगा। भाषा ज्ञान का पैमाना नहीं, अभिव्यक्ति का साधन है। जो व्यक्ति पाँच भाषाएँ जानता है, वह इसलिए बड़ा नहीं है कि उसने हिंदी छोड़ दी, बल्कि इसलिए कि उसने किसी भाषा से दुश्मनी नहीं की।
आज के डिजिटल युग में एक नया वर्ग पैदा हो गया है। मोबाइल का इंटरफेस अंग्रेजी में, संदेश हिंदी में और भाव इमोजी में। लोग लिखते हैं, “माँ आज आपकी बहुत याद आ रही है , Love You ❤️।” भाषा आधी हिंदी, आधी अंग्रेजी और बाकी लाल दिल के लिए इमोजी। शायद भविष्य का भाषाविज्ञान इसी मिश्रण पर शोध करेगा।
हिंदी दिवस का उद्देश्य अंग्रेजी को हराना नहीं है। उद्देश्य इतना भर है कि हिंदी को हर बार मंच पर बुलाकर विदा न किया जाए। उसे बैठक में भी बैठने दिया जाए, नोटशीट में भी जगह मिले, विज्ञान में भी अवसर मिले और तकनीक में भी सम्मान। राजभाषा विभाग लगातार प्रशासन और तकनीक में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के प्रयास कर रहा है, पर असली बदलाव तब आएगा जब “धन्यवाद” कहने में भी हमें उतना ही गर्व होगा जितना “थैंक यू” कहने में होता है।
इस हिंदी दिवस पर एक छोटा सा प्रयोग कीजिए। समोसा पहले की तरह खाइए, चाय भी उसी स्वाद से पीजिए, बस जाते समय मुस्कुराकर कहिए, “बहुत- बहुत धन्यवाद।” विश्वास मानिए, समोसे का स्वाद भी नहीं बदलेगा और आपकी भाषा का आत्मसम्मान थोड़ा जरूर बढ़ जाएगा।
लेखक : महेन्द्र तिवारी
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