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बच्चे को ‘चोर’ कहोगे तो वो चोरी सीखेगा, ‘समझदार’ कहोगे तो समझदारी…
एक छोटा बच्चा स्कूल से लौटा। उसके बस्ते में एक रंग-बिरंगी पेंसिल थी, जो उसकी नहीं थी। वो खुश था, उसकी आँखों में उस पेंसिल को पाने की चमक थी।
हमने उसे देखते ही कहा – “ये कहाँ से लाया? चोरी की है क्या? चोरी करते हो? पता है चोरी करना कितनी बुरी बात है? बड़े होके चोर बनना है? तुम चोर हो?”
बस, उस एक पल में हमने क्या किया? एक ऐसा बच्चा जिसे ‘चोरी’ शब्द का मतलब तक नहीं पता था, हमने उसे जीवन भर के लिए एक नया शब्द सिखा दिया – चोरी। और साथ में एक पहचान भी दे दी – कि तुम चोर हो।
जबकि हम दूसरा रास्ता भी अपना सकते थे। हम कह सकते थे – “अरे वाह, ये पेंसिल तुम्हें बहुत अच्छी लगी इसलिए ले आए? अच्छी तो है। पर ये तो तुम्हारे दोस्त की है न? उसे भी तो इसकी जरूरत होगी। कल इसे वापस कर आना, हम बाजार चलेंगे और तुम्हारे लिए इससे भी अच्छी वाली पेंसिल लेकर आएंगे। किसी की चीज बिना पूछे नहीं लेते।”
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दोनों बातों का मतलब एक ही है – कि दूसरे की चीज नहीं लेनी। पर दोनों के असर में जमीन-आसमान का फर्क है। पहली बात बच्चे को अपराधी बनाती है, दूसरी बात उसे अच्छा इंसान बनाती है। यही इस लेख का सबसे बड़ा सार है।
बच्चा खाली स्लेट की तरह होता है, उस पर क्या लिखना है ये हम तय करते हैं
बच्चा जन्म से झूठा, चोर या लालची नहीं होता। वो तो एकदम कोरे कागज की तरह होता है। उस कागज पर क्या लिखा जाएगा, ये हम माता-पिता, शिक्षक और समाज तय करते हैं।
उसे ‘झूठ’, ‘चोरी’, ‘लालच’ जैसे भारी-भरकम शब्दों का अर्थ पता ही नहीं होता। ये शब्द हम बड़े ही उसके छोटे से शब्दकोश में डालते हैं।
जब बच्चा पहली बार डर के मारे कोई बात छिपाता है, तो वह झूठ नहीं बोल रहा होता, वह खुद को डाँट से बचा रहा होता है। यह उसकी खुद को बचाने की एक मासूम कोशिश है। पर हम तुरंत उस पर ठप्पा लगा देते हैं – “तुम झूठ बोलते हो, तुम तो झूठे हो।”
बच्चा मन ही मन सोचता है – “अच्छा, तो इस काम को झूठ कहते हैं।”
जब बच्चा किसी दूसरे का सुंदर सा खिलौना या पेंसिल उठा लाता है, तो वह चोरी नहीं कर रहा होता। उसे वह चीज बस अच्छी लगी और उसे ये समझ ही नहीं है कि अच्छी लगने वाली हर चीज को उठाया नहीं जाता, उसके लिए पूछना पड़ता है। पर हम कहते हैं – “तुमने चोरी की है।”
और तब वह एक नया काम सीख लेता है – चोरी।
हम अनजाने में ही उसे उन बुराइयों से परिचित करा देते हैं, जिनसे हम उम्र भर उसे बचाना चाहते हैं। हम ही उसे बुराई का पहला पाठ पढ़ा देते हैं।
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एक बार लेबल लग गया तो बच्चा वैसा ही बन जाता है
मनोविज्ञान का एक बहुत ही सीधा और सच्चा नियम है – आप बच्चे को जैसा कहेंगे, बच्चा धीरे-धीरे खुद को वैसा ही मानने लगेगा।
अगर आप रोज-रोज कहेंगे – “तू झूठा है, तू चोर है, तू बड़ा लालची है” – तो बच्चे के मासूम मन में यह बात गहरे बैठ जाएगी कि “शायद मैं सच में ऐसा ही हूँ।” फिर वह सोचेगा कि जब मैं ऐसा हूँ ही, तो ऐसा ही सही। उसका खुद पर से भरोसा टूट जाता है। वह उस गलत पहचान को ही अपनी असली पहचान मान लेता है और फिर उसी के हिसाब से काम करने लगता है।
इसके बिल्कुल उलट, अगर आप कहेंगे – “तुम तो बहुत सच्चे बच्चे हो, तुम तो बहुत समझदार हो, तुम्हें तो अपनी चीजों का ध्यान रखना आता है” – तो वह उस अच्छी पहचान को बनाए रखने के लिए पूरी जी-जान लगा देगा। क्योंकि हर बच्चा अपने माँ-बाप की नजर में अच्छा बनना चाहता है।
तो फिर रोकें कैसे? तरीका बदलना होगा
रोकना बहुत जरूरी है, पर तरीका सही होना चाहिए। बच्चे को गलत काम से रोकना है, उसे गलत शब्द से नहीं बाँधना है।
- बच्चे पर नहीं, उसके काम पर बात करें
यह कभी मत कहो – “तुम चोर हो।” यह कहो – “बेटा, किसी की चीज बिना पूछे लेना ठीक बात नहीं है, ये अच्छी आदत नहीं है।”
यह कभी मत कहो – “तुम झूठे हो।” यह कहो – “तुमने जो बात कही, वह सच नहीं है। सच बोलने से ही सब बातें ठीक होती हैं।”
जब हम बच्चे पर नहीं, उसके काम पर बात करते हैं, तो वह खुद को बुरा इंसान महसूस नहीं करता, बल्कि अपने काम को सुधारने की कोशिश करता है। उसका आत्म-सम्मान बना रहता है।
- डर की जगह समझ और भरोसा दें
बच्चा अक्सर डर से ही गलत काम करता है। अगर उसे ये भरोसा हो जाए कि सच बताने पर उसे डाँट नहीं पड़ेगी, बल्कि प्यार से समझाया जाएगा, तो वह कभी भी झूठ का सहारा नहीं लेगा। घर में ऐसा माहौल बनाइए जहाँ सच बोलना सबसे आसान और सबसे सुरक्षित लगे।
- सिर्फ ‘मत करो’ नहीं, ‘क्या करो’ भी बताएं
सिर्फ मना करने से बच्चा कन्फ्यूज हो जाता है। उसे सही रास्ता भी दिखाइए।
“दूसरे की पेंसिल मत लो” कहने की जगह कहें – “ये पेंसिल तुम्हारे दोस्त की है, कल उसे वापस कर देना। हम तुम्हारे लिए तुम्हारी पसंद की नई पेंसिल लाएंगे।”
“झूठ मत बोलो” कहने की जगह कहें – “कोई बात नहीं, जो हुआ सच-सच बता दो, हम मिलकर उसे ठीक कर देंगे।”
- छोटी जीत की तारीफ करें, बड़ा असर होगा
मान लीजिए बच्चा अपना होमवर्क पूरा करके खेलने गया है, तो कहें – “तुमने अपना काम खुद पूरा किया, तुम तो बहुत जिम्मेदार हो गए हो।” जब वह अपनी किताबें खुद समेटता है, तो कहें – “तुम अपनी चीजों का कितना अच्छे से ध्यान रखते हो।”
जब आप उसकी छोटी-छोटी अच्छी आदतों को बड़ा बनाकर उसकी तारीफ करेंगे, तो वह खुद-ब-खुद बुरी आदतों को छोड़ देगा। उसे अच्छा बनने में मजा आने लगेगा।
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याद रखिए, शब्द हथौड़े की तरह होते हैं। अगर गलत जगह पर मारोगे तो पत्थर टूट जाएगा, और अगर सही जगह पर मारोगे तो एक सुंदर मूर्ति बन जाएगी।
बच्चे को ‘बुराई’ का नाम मत सिखाइए, उसे ‘अच्छाई’ का काम सिखाइए। वो चोरी क्या होती है, नहीं जानता। वो बस इतना जानता है कि उसे वो पेंसिल अच्छी लगी। उसे झूठ क्या होता है, नहीं पता। वो बस डर रहा था।
हमारा काम उसे दुनिया की बुरी शब्दावली से परिचित कराना नहीं है, बल्कि उसकी मासूमियत को इतने प्यार से संभालना है कि बुराई खुद-ब-खुद उससे दूर रहे।
क्योंकि बच्चे वो नहीं बनते जो हम कहते हैं कि “मत बनो”, बच्चे वो बनते हैं जो हम प्यार से उन्हें बनना सिखाते हैं।
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