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Hindi News / भारतीय संस्कृति

जब दीवारों के कान नहीं, दिल सुन रहे होते हैं : माँ-बाप के झगड़ों का बच्चों पर असर…

हमारे घरों में अक्सर कहा जाता है - "पति-पत्नी में तो कहा-सुनी होती ही रहती है, इसमें कौन सी बड़ी बात है।" बड़ी बात है, बहुत बड़ी बात है। बात तब बड़ी बन जाती है...

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<span class="title-highlight-color">जब दीवारों के कान नहीं, दिल सुन रहे होते हैं :</span> माँ-बाप के झगड़ों का बच्चों पर असर…

हमारे घरों में अक्सर कहा जाता है – “पति-पत्नी में तो कहा-सुनी होती ही रहती है, इसमें कौन सी बड़ी बात है।” बड़ी बात है, बहुत बड़ी बात है। बात तब बड़ी बन जाती है जब उसी घर के कोने में एक छोटा बच्चा बैठा, अपने खिलौनों से खेलते हुए सब सुन रहा होता है, सब महसूस कर रहा होता है।

हम सोचते हैं कि बच्चा छोटा है, उसे क्या समझ आएगा। पर सच तो यह है कि बच्चा हमारे शब्दों से ज्यादा हमारे चेहरे के भावों को, हमारी आँखों के आंसुओं को और हमारी आवाज के उतार-चढ़ाव को समझता है। जब घर में माँ-बाप के बीच तेज आवाजें, ताने और दरवाजे बंद होने लगते हैं, तो बच्चे की पूरी दुनिया हिल जाती है। उसके लिए माँ और पापा दो लोग नहीं, बल्कि उसकी पूरी कायनात हैं। उसकी सुरक्षा की दो मजबूत दीवारें हैं। जब वही दो दीवारें आपस में टकराती हैं, तो उस छोटे से दिल में एक बहुत बड़ा भूचाल आ जाता है।

बच्चों के मासूम दिल पर क्या बीतती है?

यह सबसे पहला और सबसे गहरा घाव है। छोटे बच्चे अक्सर सोचते हैं कि सब कुछ उनकी वजह से हो रहा है। जब माता-पिता लड़ते हैं, तो बच्चा मन ही मन सोच लेता है – “मैंने होमवर्क नहीं किया इसलिए पापा नाराज हैं”, “मैंने जिद की थी इसलिए मम्मी रो रही हैं।” यह सोच उसे अंदर ही अंदर खाने लगती है। वह धीरे-धीरे अपनी खुशी, अपनी छोटी-छोटी इच्छाएं मांगना ही बंद कर देता है। वह बहुत ज्यादा समझदार और खामोश बनने की कोशिश करता है, जो उसकी उम्र के लिए ठीक नहीं है।

जिस घर को बच्चे का सबसे महफूज ठिकाना होना चाहिए, वही घर उसके लिए सबसे डरावनी जगह बन जाता है। ऐसे बच्चे अक्सर रात को चौंक कर उठ जाते हैं, उन्हें बुरे सपने आते हैं, वे अकेले सोने से डरते हैं। स्कूल में उनका मन नहीं लगता। क्लास में बैठे-बैठे भी उनका दिमाग घर में ही अटका रहता है – “पता नहीं, घर जाऊंगा तो फिर से लड़ाई तो नहीं हो रही होगी।” यह लगातार बना रहने वाला डर उसके दिमाग और उसकी पढ़ाई दोनों को कमजोर कर देता है।

बच्चा प्यार का पहला पाठ अपने माँ-बाप को देखकर ही सीखता है। अगर उसने बचपन से ही प्यार के नाम पर सिर्फ चिल्लाना, रोना और नाराज होना देखा है, तो वह भी यही समझेगा कि प्यार ऐसा ही होता है। बड़े होकर ऐसे बच्चों को किसी पर भी भरोसा करने में बहुत मुश्किल होती है। उन्हें लगता है कि जिसे हम प्यार करते हैं, वह हमें दुख ही देगा। कुछ बच्चे तो रिश्ते बनाने से ही डरने लगते हैं।

ऐसे माहौल में पले-बढ़े बच्चों में अक्सर दो तरह के बदलाव देखे जाते हैं। कुछ बच्चे बहुत ज्यादा गुस्से वाले बन जाते हैं। वे छोटी-छोटी बात पर चिल्लाने लगते हैं, दोस्तों से मारपीट करने लगते हैं, क्योंकि घर में उन्होंने समस्या को सुलझाने का यही तरीका देखा है।

और कुछ बच्चे बिल्कुल इसके उलट हो जाते हैं। वे बहुत ज्यादा चुप-चुप रहने लगते हैं। वे अपनी कोई भी बात, चाहे खुशी हो या दुख, किसी से भी नहीं कहते। वे अपने मन में एक छोटी सी दुनिया बना लेते हैं और उसी में रहने लगते हैं। हँसना-खेलना जैसे वे भूल ही जाते हैं। याद रखिए, जरूरत से ज्यादा शांत बच्चा भी उतना ही चिंता का विषय है जितना कि बहुत ज्यादा गुस्से वाला बच्चा।

यह सिर्फ मन की बात नहीं है। लगातार डर और टेंशन में रहने वाले बच्चों को अक्सर पेट में दर्द, सिर में दर्द, भूख न लगना जैसी शिकायतें रहती हैं। वे बार-बार बीमार पड़ने लगते हैं, क्योंकि चिंता उनके शरीर की ताकत को भी कमजोर कर देती है।

जिस बच्चे का मन घर में ही उलझा हुआ है, वह बाहर की दुनिया में कैसे अच्छा कर पाएगा? ऐसे बच्चों के नंबर धीरे-धीरे कम होने लगते हैं। वे दोस्त बनाना भी पसंद नहीं करते, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर कोई उनके घर आएगा तो उसे भी उनके घर की सच्चाई पता चल जाएगी।

तो हम माता-पिता के तौर पर क्या करें?

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पति-पत्नी में कभी मतभेद नहीं होंगे। दो अलग सोच वाले लोगों में अलग राय होना बहुत स्वाभाविक है। असली बात यह है कि हम उस अलग राय को कैसे संभालते हैं।

यह सबसे पहला और सबसे जरूरी नियम है। अगर आपको लग रहा है कि बात बढ़ रही है और गुस्सा तेज हो रहा है, तो खुद को वहीं रोक दीजिए। एक गिलास पानी पी लीजिए और तय कर लीजिए कि इस मुद्दे पर हम बाद में, जब बच्चा सो जाएगा या स्कूल गया होगा, तब अकेले में बात करेंगे।

अक्सर गुस्से में हम कह देते हैं – “बेटा, तू ही बता मैं गलत हूँ क्या?” या “देख ले अपने पापा को”। ऐसा करके हम अपने बच्चे को एक ऐसी अदालत में खड़ा कर देते हैं जहाँ उसे अपने ही माँ-बाप में से एक को चुनना पड़े। वह आपका बच्चा है, आपका वकील या जज नहीं। उसे इस बोझ से दूर रखिए।

मान लीजिए कभी गुस्से में बहस हो भी गई, तो सुलह का रास्ता भी बच्चे को जरूर दिखाएं। उसके पास जाकर प्यार से कहें – “बेटा, थोड़ी देर पहले मम्मी-पापा में किसी बात को लेकर अलग-अलग सोच थी, इसलिए थोड़ी तेज आवाज हो गई। पर अब हमने बात कर ली है और सब ठीक है।” इससे वह यह सीखेगा कि रिश्तों में मुश्किलें आती हैं, पर उन्हें बात करके सुलझाया भी जा सकता है।

बच्चे के सामने एक-दूसरे की छोटी-छोटी मदद करें, इज्जत से बात करें। “शुक्रिया” और “माफ करना” जैसे शब्द कहने में कभी भी कंजूसी न करें। जब बच्चा देखेगा कि पापा मम्मी की इज्जत कर रहे हैं और मम्मी पापा का सम्मान कर रही हैं, तो वह भी वही सीखेगा।

बच्चे दीवारों पर लिखी इबारतें नहीं पढ़ते, वे आपका चेहरा पढ़ते हैं।

वे आपके उपदेशों से नहीं, आपके बर्ताव से सीखते हैं।

आप दुनिया के लिए सिर्फ एक पति-पत्नी हो सकते हैं, पर अपने बच्चे के लिए आप पूरी दुनिया हैं।

तो अपने घर को ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि मीठी आवाजों, हँसी और सुकून से बनाइए। एक ऐसा घर जहाँ बच्चे के कानों में चीखें नहीं, बल्कि लोरी और हँसी की गूंज हमेशा याद रहे।

लेखिका
आर. जे. रेखा क्रिस्टल वॉयस
आकाशवाणी FM Gold दिल्ली 100.1

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