कुछ दिन से एक महिला पति की बीमारी के चलते बहुत परेशान थी आर्थिक और मानसिक दोनों तरह से। उसकी मदद के लिए उसका कोई अपना नहीं। महिला बहुत गरीब है। बीमार पति का ब्रेन ट्यूमर का ऑपरेशन किसी तरह सरकारी अस्पताल में कोशिश करके कराया हमने। कुछ सब्जी में नमक भर मदद आर्थिक तौर पर करने की कोशिश भी की लेकिन सबसे खास बात बस इसकी तकलीफ में उसके साथ खड़ी हो गई। उसका दर्द सुन लिया उसे एहसास दिया कि वो अकेली नहीं है इस तकलीफ में कोई है उसके साथ।
आज मेरी मां की उम्र की इस महिला ने मुझसे कहा कि “मुझे आपसे मिलकर ऐसा लगा जैसे मेरी माँ या माँ जैसा कोई मिल गया। बहुत अकेली पड़ गई थी। बहुत हिम्मत मिली।” ये कहते हुए वो बेहद भावुक हो गई।
उस पल लगा कि आज कितने सारे लोगों को कोई अपना सा नहीं मिलता। कितने सारे लोग एक एहसास के लिए तरस रहे हैं। जैसे किसी डूबते को तिनके का सहारा भी बहुत लगता है।
दुनिया में सब जानते हैं कि खुश रहना चाहिए। टेंशन नहीं लेनी चाहिए। बीती बातों को भूलकर आगे बढ़ जाना चाहिए। जो हो गया सो हो गया, अब उसे सोचकर क्या फायदा। हौंसला रखो, हिम्मत रखो सब ठीक हो जाएगा टेंशन मत लो। ऐसी हजारों बातें जो हम सलाह के तौर पर किसी को देते हैं। ये बातें हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। दीवारों पर लिखी हैं, किताबों में छपी हैं, हर रील में, हर मोटिवेशनल स्पीकर के मुंह पर यही ज्ञान है।
और ये ज्ञान गलत भी नहीं है। सच ही तो है।
पर सवाल ये है कि ये बात सबको सब पता है,फिर भी लोग दुखी क्यों हैं? डिप्रेशन क्यों बढ़ रहा है? रातों को नींद क्यों नहीं आती? अगर खुश रहना इतना ही आसान है, तो हर दूसरा इंसान अंदर से खाली क्यों महसूस करता है?
क्योंकि हकीकत में जब कोई इंसान सच में टूटा होता है, तो उसे ज्ञान की नहीं, इंसान की जरूरत होती है।
लेकिन जब भी कोई अपनी तकलीफ किसी को बताने की कोशिश करता है, लोग सुनते ही नहीं हैं। सुनने से पहले ही उनके पास जवाब तैयार होता है।
कोई कहता है “मेरा ब्रेकअप हो गया, बहुत तकलीफ में हूँ।” जवाब आता है – “अरे छोड़ यार, इससे अच्छी मिलेगी। लड़की और गाड़ी के पीछे नहीं भागते एक गई तो दूसरी मिल जाएगी।”
कोई कहता है “नौकरी चली गई, घर कैसे चलेगा समझ नहीं आ रहा।” जवाब आता है – “टेंशन मत ले, सब ठीक हो जाएगा, पॉजिटिव सोच।”
कोई कहता है “मैं थक गया हूँ, अब और हिम्मत नहीं है।” लोग कह देते हैं – “तू तो बहुत स्ट्रांग है, तू कर लेगा। मुझे तुझपे पूरा भरोसा है।
चार लाइन की रेडीमेड सलाह देकर या हौंसला बढ़ा कर लोग अपनी जिम्मेदारी से निकल जाते हैं। उन्हें लगता है उन्होंने बहुत बड़ा एहसान कर दिया। उन्हें लगता है उन्होंने सामने वाले को ठीक कर दिया। पर वो कभी ये नहीं समझते कि सामने वाले को उस वक्त सलाह चाहिए ही नहीं थी।
कभी-कभी इंसान को समाधान नहीं चाहिए होता, उसे सिर्फ सुनने वाले दो कान चाहिए होते हैं। जो बिना बीच में टोके, बिना अपनी कहानी शुरू किए, बिना जज किए, बस सुन सकें।
उसे एक दिल चाहिए होता है जो उसके दर्द को सच में महसूस कर सके, उसका मजाक न उड़ाए, उसे कमजोर न कहे।
और उसे एक हाथ चाहिए होता है, जो आकर कंधे पर रखकर बस इतना कह दे – “मैं हूँ ना। तू अकेला नहीं है।”
आज हमारे पास सब कुछ है। हाथ में स्मार्टफोन है जिसमें 5000 कॉन्टैक्ट हैं, इंस्टाग्राम पर हजारों फॉलोअर्स हैं, स्टोरी देखने वाले सैकड़ों लोग हैं। पर क्या हमारे पास एक भी ऐसा इंसान है, जिसके सामने हम बिना फिल्टर के रो सकें? जिसके सामने हम ये कह सकें कि “यार आज मैं बिल्कुल ठीक नहीं हूँ, आज मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा?”
नहीं है। क्योंकि हमने सुनना बंद कर दिया है। हम सब बोलना चाहते हैं।
हम इतने समझदार और बिजी हो गए हैं कि हर किसी को जज करने लगे हैं। कोई लड़का रो रहा है तो हम कहते हैं “लड़के रोते नहीं।” कोई लड़की अपनी थकान बता रही है तो हम कहते हैं “नाजुक परी की तरह बिहेव कर रही है।” कोई अपनी असफलता बता रहा है तो हम मन ही मन सोचते हैं “जरूर इसने ही कोई गलती की होगी।”
इसी जल्दबाजी में हम एक बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। हम लोगों को सलाह देकर या उन्हें खुद ही जज करके उनकी तकलीफ को छोटा कर देते हैं।
जब हम किसी दुखी इंसान को कहते हैं “अरे ये तो छोटी सी बात है, खुश रहो”, तो हम अनजाने में उसे ये बता रहे होते हैं कि तुम्हारा दुख इतना बड़ा नहीं है कि उस पर बात की जाए। वहीं से वो इंसान चुप हो जाता है। और वहीं से अकेलापन शुरू होता है।
इसीलिए आज हर दूसरा इंसान भीड़ में भी अकेला है। परिवार के साथ बैठकर भी अकेला है। वो हँसता है, फोटो डालता है, जन्मदिन पर सबको विश करता है, पर अंदर ही अंदर घुटता रहता है। क्योंकि उसे पता है, अगर उसने अपना सच बताया तो लोग ज्ञान भले दे देंगे, साथ नहीं।
हमें ये समझना होगा कि हर बार समाधान की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी सिर्फ साथ की जरूरत होती है।
बचपन याद कीजिए। जब हम गिर जाते थे, तो माँ पहले दवा नहीं लगाती थी, पहले गले लगाती थी। वो गले लगना ही आधी चोट ठीक कर देता था। बड़े होने पर हमें दवा से ज्यादा उसी गले लगने की जरूरत है।
किसी के मन का गुबार निकालने का जरिया बनना भी दुनिया की सबसे बड़ी इंसानियत है। किसी को बिना उसकी बात काटे, बिना उसे लेक्चर दिए, बस सुनते रहना – ये भी एक तपस्या है, जो आज खत्म होती जा रही है।
अगर आप सच में किसी के अपने बनना चाहते हैं, तो ज्ञानी मत बनिए, हमदर्द बनिए।
अगर आपके पास कोई आए, अपना दुख लेकर, तो उसे पॉजिटिविटी का भाषण मत दीजिए। उस ज्ञान का वो क्या करेगा जो गूगल पर भी दो सेकंड में मिल जाता है।
आप बस इतना कीजिए
अपना फोन नीचे रख दीजिए, उसकी आँखों में देखिए और सुन लीजिए।
उससे पूछिए – “और बताओ, अंदर से कैसा लग रहा है तुम्हें?”
उससे कहिए – “रोना आ रहा है तो रो लो, मैं यहीं बैठा हूँ, कहीं नहीं जाऊंगा।”
अगर कुछ समझ न आए तो उसका हाथ पकड़ लीजिए और कुछ मत कहिए। कभी-कभी हमारी खामोशी भी हजार शब्दों से ज्यादा सुकून देती है।
याद रखिए, लोग कभी नहीं भूलते कि आपने उन्हें क्या सलाह दी थी। लोग हमेशा याद रखते हैं कि बुरे वक्त में आपने उन्हें कैसा महसूस कराया था। आपका दिया हुआ दस मिनट का ध्यान, किसी की पूरी रात की बेचैनी खत्म कर सकता है। आपका एक “मैं समझ सकता हूँ” किसी को टूटने से बचा सकता है।
ज्ञान बाँटने वाले तो इस दुनिया में गली-गली में मिल जाएंगे। आप वो बनिए जो बिना बोले भी किसी का दर्द समझ ले। जो बिना जज किए किसी को अपना कंधा दे दे।
क्योंकि आखिर में, इस पूरी दुनिया में ज्ञान तो सबके पास है, पर बिना जज किए सुनने वाला एक अपना, आज सच में किसी के पास नहीं है। और जो इंसान ये सुनने की कला सीख गया, समझ लीजिए उसने जिंदगी की सबसे बड़ी डिग्री ले ली। इसलिए अपनी सलाह से पहले किसी के लिए अपने दो कान खोल लीजिए। थोड़ा दिल खोल लीजिए। बस किसी को बस थोड़ा सुन भर लीजिए।
लेखिका
आर. जे. रेखा क्रिस्टल वॉयस
आकाशवाणी FM Gold दिल्ली 100.1
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